Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 571

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- मनुराप्सवः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
प꣡व꣢स्व दे꣣व꣡वी꣢तय꣣ इ꣢न्दो꣣ धा꣡रा꣢भि꣣रो꣡ज꣢सा । आ꣢ क꣣ल꣢शं꣣ म꣡धु꣢मान्त्सोम नः सदः ॥५७१॥

प꣡व꣢꣯स्व । दे꣣व꣡वी꣢तये । दे꣣व꣢ । वी꣣तये । इ꣡न्दो꣢꣯ । धा꣡रा꣢꣯भिः । ओ꣡ज꣢꣯सा । आ । क꣣ल꣡श꣢म् । म꣡धु꣢꣯मान् । सो꣣म । नः । सदः ॥५७१॥

Mantra without Swara
पवस्व देववीतय इन्दो धाराभिरोजसा । आ कलशं मधुमान्त्सोम नः सदः ॥

पवस्व । देववीतये । देव । वीतये । इन्दो । धाराभिः । ओजसा । आ । कलशम् । मधुमान् । सोम । नः । सदः ॥५७१॥

Samveda - Mantra Number : 571
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 10;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(इन्दो) सोम ! (धाराभिः) प्रवाहों से (ओजसा) बलपूर्वक (देववीतये) वायु आदि देवों के भोजनार्थ (पवस्व) जा। तथा (सोम) ओषधे ! (मधुमान्) माधुर्ययुक्त (नः) हमारे (कलशम्) द्रोणकलश में (आ सदः) स्थित हो॥
अथवा—(इन्दो) परमेश्वर ! (देववीतये) विद्वान् उपासकों को मिलने के लिये (पवस्व) प्राप्त हूजिये (ओजसा) अपने अनन्त सामर्थ्य से (मधुमान्) आन्दस्वरूपयुक्त (सोम) शान्तस्वरूप ! भगवन् ! (धाराभिः) अमृतद्रव के प्रवाहों से (नः) हमारे (कलशम्) हृदय घट में (आसदः) विराजिये॥
Footnote
वी धातु क्रम से भोजनार्थ और गत्यर्थ मान कर देववीतये प्रयोग है। इसका अग्निष्टोम यज्ञ के ९ वें दिन में विनियोग है। विवरणकार का मत है॥
ऋ० ९। १०६। ७ में भी॥