Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 57

1875 Mantra
Devata- यूप Rishi- कण्वो घौरः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
ऊ꣣र्ध्व꣢ ऊ꣣ षु꣡ ण꣢ ऊ꣣त꣢ये꣣ ति꣡ष्ठा꣢ दे꣢वो꣡ न स꣢꣯वि꣣ता꣢ । ऊ꣣र्ध्वो꣡ वाज꣢꣯स्य꣣ स꣡नि꣢ता꣣ य꣢द꣣ञ्जि꣡भि꣢र्वा꣢घ꣡द्भि꣢र्वि꣣ह्व꣡या꣢महे ॥५७॥

ऊ꣣र्ध्वः꣢ । ऊ꣣ । सु꣢ । नः꣢ । ऊत꣡ये꣣ । ति꣡ष्ठ꣢꣯ । दे꣣वः꣢ । न । स꣣विता꣢ । ऊ꣣र्ध्वः꣢ । वा꣡ज꣢꣯स्य । स꣡नि꣢꣯ता । यत् । अ꣣ञ्जिभिः꣢ । वा꣣घ꣡द्भिः꣢ । वि꣣ह्व꣡या꣢महे । वि꣣ । ह्व꣡या꣢꣯महे ॥५७॥

Mantra without Swara
ऊर्ध्व ऊ षु ण ऊतये तिष्ठा देवो न सविता । ऊर्ध्वो वाजस्य सनिता यदञ्जिभिर्वाघद्भिर्विह्वयामहे ॥

ऊर्ध्वः । ऊ । सु । नः । ऊतये । तिष्ठ । देवः । न । सविता । ऊर्ध्वः । वाजस्य । सनिता । यत् । अञ्जिभिः । वाघद्भिः । विह्वयामहे । वि । ह्वयामहे ॥५७॥

Samveda - Mantra Number : 57
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
प्रकरण से हे अग्ने ! परमात्मन् ! (नः ऊतये) हमारी रक्षा के लिये (देवः, सविता, न) सूर्य देव के समान (ऊर्ध्वः) उच्च भाव से युक्त (सु, तिष्ठ) स्थित हूजिये (वाजस्य) आत्मिक बल के (ऊर्ध्वः) उच्च (सनिता) दाता हूजिये। (यत्) क्योंकि हम (अञ्जिमिः) स्नेह भक्तिवाले (वाघद्भिः) मेधावियों सहित (वि-ह्वयामहे) पूजते हैं। (ऊ) पादपूरणार्थ है॥
हे दयालु ! पिता ! हमारी रक्षा के लिये ऊँचा हाथ करिये और हमको सूर्य के से प्रकाशित उच्चभाव से आत्मिक बल दीजिये अर्थात् महती रक्षा और आत्मिक बल का महादान दीजिये। हम सब बुद्धिमानों सहित आपकी शरण में हैं, आपका पूजन करते हैं।
भौतिक पक्ष में—अग्ने ! तू (नः ऊतये) हमारी रक्षा के लिये (देवः, सविता, न) सूर्य देव के समान (ऊर्ध्वः) उच्च प्रदीप्त होकर (सु-तिष्ठ) भले प्रकार ठहर और (वाजस्य, ऊर्ध्वः, सनिता) बल और अन्न का, उच्च, दाता हो (यत्) क्योंकि हम (अञ्जिभिः) घृतादियुक्त (वाघद्भिः) होता आदि ऋत्विजों द्वारा (वि-ह्वयामहे) विशेष करके होम करते हैं॥
तात्पर्य यह है कि यह भौतिक अग्नि कुण्डादि में उच्चभाव से सूर्य के समान प्रदीप्त किया जाना चाहिये। जिससे रोगादि से हमारी रक्षा हो। क्योंकि हम स्नेह अर्थात् घृतादि उत्तम पदार्थ वाले होता आदि से होम कराते तथा करते हैं। जिससे वृष्टि द्वारा हमारा अन्न और बल बढ़े॥
इस मन्त्र में (ऊर्ध्वः तिष्ठ) इस चिह्न को देखकर किसी-किसी ने यज्ञ के “यूप” को खड़ा करने में इस ऋचा का विनियोग किया है। इसी कारण सायणाचार्य ने इसका “यूप” देवता लिखा है। परन्तु मूल मन्त्र में यूप वा यूप का वाचक कोई शब्द नहीं आया, तथा अग्नि का प्रकरण भी आरम्भ से ही चला आता है इसलिये हमने तो अग्नि ही देवता माना है। तथा सायणाचार्य ने भी (यद्वा, यूपात्मकदारुनिष्ठाग्ने !) अर्थात् हे यूप के काष्ठ में रहने वाले अग्नि !, यह भी व्याख्या की है। जिससे एक पक्ष में सायणाचार्य को भी अग्नि देवता सम्मत प्रतीत होता है।
Footnote
अष्टाध्यायी ८।३।१०७॥ ८।४।२६॥ ६।३।१३५॥ निघण्टु २। ७॥ २। ९॥ ३।१४॥ ३।१५॥ ३।१८ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋ० १। ३६। ३ में मी ऐसी ऋचा है॥