Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 563

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- वत्सप्रिर्भालन्दः Chhand- जगती Swara- निषादः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
प्र꣢ दे꣣व꣢꣫मच्छा꣣ म꣡धु꣢मन्त꣣ इ꣢न्द꣣वो꣡ऽसि꣢ष्यदन्त꣣ गा꣢व꣣ आ꣢꣫ न धे꣣न꣡वः꣢ । ब꣣र्हिष꣡दो꣢ वच꣣ना꣡व꣢न्त꣣ ऊ꣡ध꣢भिः परि꣣स्रु꣡त꣢मु꣣स्रि꣡या꣢ नि꣣र्णि꣡जं꣢ धिरे ॥५६३॥

प्र꣢ । दे꣣व꣢म् । अ꣡च्छ꣢꣯ । म꣡धु꣢꣯मन्तः । इ꣡न्द꣢꣯वः । अ꣡सि꣢꣯ष्यदन्त । गा꣡वः꣢꣯ । आ । न । धे꣣न꣡वः꣢ । ब꣣र्हि꣡षदः꣢ । ब꣣र्हि । स꣡दः꣢꣯ । व꣣चना꣡व꣢न्तः । ऊ꣡ध꣢꣯भिः । प꣣रिस्रु꣡त꣢म् । प꣣रि । स्रु꣡त꣢꣯म् । उ꣣स्रि꣡याः꣢ । उ꣣ । स्रि꣡याः꣢꣯ । नि꣣र्णि꣡ज꣢म् । निः꣣ । नि꣡ज꣢꣯म् । धि꣣रे ॥५६३॥

Mantra without Swara
प्र देवमच्छा मधुमन्त इन्दवोऽसिष्यदन्त गाव आ न धेनवः । बर्हिषदो वचनावन्त ऊधभिः परिस्रुतमुस्रिया निर्णिजं धिरे ॥

प्र । देवम् । अच्छ । मधुमन्तः । इन्दवः । असिष्यदन्त । गावः । आ । न । धेनवः । बर्हिषदः । बर्हि । सदः । वचनावन्तः । ऊधभिः । परिस्रुतम् । परि । स्रुतम् । उस्रियाः । उ । स्रियाः । निर्णिजम् । निः । निजम् । धिरे ॥५६३॥

Samveda - Mantra Number : 563
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 9;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(मधुमन्तः) माधुर्ययुक्त (इन्दवः) सोम (वचनावन्तः) शब्दयुक्त हुए (अच्छ) व्याप कर (देवम्) इन्द्र नामक विद्युत् को (प्र, असिव्यदन्त) ग्रहनामक घटों में से टपक [निकल] कर जाते हैं तथा (गावः) सूर्य की किरणें (बर्हिषदः) जो कि यज्ञ में स्थित हैं वे (परिस्त्रुतम्) उस टपके हुए (निर्णिजम्) शुद्धिकारक सोम का (आ धिरे) आधान करती हैं (न) जैसे (धेनवः उस्त्रियाः) दुधार गौवें (ऊधभिः) बाखों से दूध की आधान करती हैं॥
Footnote
अब हम उन घटों के नाम बताते हैं कि जो व्यावहारिक भिन्न-भिन्न देवतों को आहुति देने के लिए सोम से भरे हुए रक्खे जाते हैं। ३—सवनों में ३४ घट होते हैं। प्रातः सवन में २५ होते हैं। जैसा कि १—उपांशु २—अन्तर्याम ३—ऐन्द्रवायव ४–मैत्रावरुण ५—आश्विन ६—शुक्र ७— मन्थी ८—आग्रयण ९—उक्थ १०—ध्रुव ११ से २३ तक तेरह ऋतुग्रह २४—ऐन्द्राग्न और २५—वैश्वदेव॥
माध्यन्दिन सवन में ४ होते हैं। ३ मारुत्वतीय, चतुर्थ माहेन्द्र॥ तृतीयसवन में ५ होते हैं। १—आदित्य २—सावित्र ३—महावैश्वदेव ४— पात्नीवत और ५—हारियोजन॥ ३४॥ निघण्टु २। ११ में उस्रिया गौ का नाम है। ऋ० ९। ६८। १ में भी॥ १०॥