Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 560

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- रेणुर्वैश्वामित्रः Chhand- जगती Swara- निषादः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
त्रि꣡र꣢स्मै स꣣प्त꣢ धे꣣न꣡वो꣢ दुदुह्रिरे स꣣त्या꣢मा꣣शि꣡रं꣢ पर꣣मे꣡ व्यो꣢मनि । च꣣त्वा꣢र्य꣣न्या꣡ भुव꣢꣯नानि नि꣣र्णि꣢जे꣣ चा꣡रू꣢णि चक्रे꣣ य꣢दृ꣣तै꣡रव꣢꣯र्धत ॥५६०॥

त्रिः꣢ । अ꣣स्मै । सप्त꣢ । धे꣣न꣡वः꣢ । दु꣣दुह्रिरे । सत्या꣢म् । आ꣣शि꣡र꣢म् । आ꣣ । शि꣡र꣢꣯म् । प꣣रमे꣢ । व्यो꣢मन् । वि । ओ꣣मनि । चत्वा꣡रि꣢ । अ꣣न्या꣢ । अ꣣न् । या꣢ । भु꣡व꣢꣯नानि । नि꣣र्णि꣡जे꣢ । निः꣣ । नि꣡जे꣢꣯ । चा꣡रू꣢꣯णि । च꣣क्रे । य꣢त् । ऋ꣣तैः꣢ । अ꣡व꣢꣯र्धत ॥५६०॥

Mantra without Swara
त्रिरस्मै सप्त धेनवो दुदुह्रिरे सत्यामाशिरं परमे व्योमनि । चत्वार्यन्या भुवनानि निर्णिजे चारूणि चक्रे यदृतैरवर्धत ॥

त्रिः । अस्मै । सप्त । धेनवः । दुदुह्रिरे । सत्याम् । आशिरम् । आ । शिरम् । परमे । व्योमन् । वि । ओमनि । चत्वारि । अन्या । अन् । या । भुवनानि । निर्णिजे । निः । निजे । चारूणि । चक्रे । यत् । ऋतैः । अवर्धत ॥५६०॥

Samveda - Mantra Number : 560
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 9;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(यत्) जब कि सोम (ऋतैः) यज्ञों से (अवर्षत) बढ़ता है [तब] (सप्त) ७ सात (धेनवः) वाणियें (अस्मै) इस सोम के लिये (सत्याम्) सच्चे (आशिरम्) आशिष को (दुदुह्रिरे) पूरित करती हैं। तथा यह सोम (परमे) बड़े (व्योमनि) आकाश में (अन्या चत्वारि) अन्य चार (भुवनानि) भुवन अर्थात् पृथिवी अन्तरिक्ष द्यौः और दिशाओं को (निर्णिजे) शुद्ध करने के लिये (चरूणि) सुन्दर कल्याणरूप (चक्रे) करता है॥
Footnote
विवरणकार कहते हैं कि “इसका विनियोग ३ तीसरे दिन में होता हैं। इस सोम के लिये। ७ धेनु=७ छन्द। ३=प्रातः माध्यन्दिन और तृतीय सवनों में पूरित करते हैं। अथवा ३ सवनों से ७ घेनु =७ अहोरात्र, वषट्कारी लोग = १ होता २ मैत्रावरुण ३ ब्राह्मणाच्छंसी ४ पोता ५ नेष्टा ६ अच्छावाक ७ आग्नीध्र; इनकी वाणिये दुही जाती हैं। अथवा धेनुओं से दुहा जाता है सच्चा आशिर = आश्रयण वा मिश्रण। उत्तम व्योम = स्थान वा यज्ञ में। ४ अत्यग्निष्टोम, उक्थ, षोडशी और अतिरात्र चौथा। अथवा पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्यौ और दिशायें। अथवा ४ वेद। अथवा ४ महाऋत्विज् अथवा ४ समुद्र। भुवनों को शोधने के लिये = १४ भुवन–७ भू आदि लोक ७ पाताल; इनकी भी कल्याण रूप करता है। किस प्रकार से ? जब कि ऋत = रत्नों वा यज्ञों से बढ़ता है। अथवा उसके लिये ७ धेनु = ७ किरणें प्रपूरित करती हैं। अथवा ७ सूर्यकिरणों के रंग। अथवा ७ अग्नि की लपटें। वा ७ माता=भू आदि लोक। ७ पाताल =७ सोमसंस्था वा ७ समुद्र वा ७ द्वीप वा ७ स्वर। ये ७ पूरित करते हैं।” आशिर = उदक। बड़े आकाश में। ४ अन्य भुवनों पृथिव्यादिकों को सुन्दर करता है। जब यज्ञों से बढ़ता है। अथवा ७ धेनु = ७ शिरःस्थानी प्राण। ३ उत्पत्ति स्थिति प्रलयों में सत्य ज्ञान को। ४ भुवन =जाग्रत स्वप्न सुषुप्तिं तुरीयावस्थाओं में = अद्वैत अवस्था वाले में उन मनुष्यों से विज्ञानार्थ बढ़ता है॥”
ऋ० ९। ७०। १ का पाठभेद संस्कृतभाष्य में देखिये॥