Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 553

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- प्रजापतिर्वैश्वामित्रो वाच्यो वा Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
प्र꣡ सु꣢न्वा꣣ना꣡यास्यान्ध꣢꣯सो꣣ म꣢र्तो꣣ न꣡ व꣢ष्ट꣣ त꣡द्वचः꣢꣯ । अ꣢प꣣ श्वा꣡न꣢मरा꣣ध꣡स꣢ꣳ ह꣣ता꣢ म꣣खं꣡ न भृग꣢꣯वः ॥५५३॥

प्र꣢ । सु꣣न्वाना꣡य꣢ । अ꣡न्ध꣢꣯सः । म꣡र्तः꣢꣯ । न । व꣣ष्ट । त꣢त् । व꣡चः꣢꣯ । अ꣡प꣢꣯ । श्वा꣡न꣢꣯म् । अ꣣राध꣡स꣢म् । अ꣣ । राध꣡स꣢म् । ह꣣त꣢ । म꣣ख꣢म् । न । भृ꣡ग꣢꣯वः ॥५५३॥

Mantra without Swara
प्र सुन्वानायास्यान्धसो मर्तो न वष्ट तद्वचः । अप श्वानमराधसꣳ हता मखं न भृगवः ॥

प्र । सुन्वानाय । अन्धसः । मर्तः । न । वष्ट । तत् । वचः । अप । श्वानम् । अराधसम् । अ । राधसम् । हत । मखम् । न । भृगवः ॥५५३॥

Samveda - Mantra Number : 553
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 8;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(भृगवः) हे ज्ञानी मनुष्यो ! जो कोई (अन्धसः) सोमादि ओषधिरूप अन्न का (सुन्वानाय) सम्पादन करने वाला (मर्तः) मनुष्य अध्वर्यु और उसके उपलक्षण से अन्य ऋत्विज् हैं (तद्वचः) उसके वा उनके वचन [याचना] की (न प्र वष्ट) मत इच्छा करो अर्थात् बिना याचना ही दक्षिणा दो और (अराधसम्) बिबिना दक्षिणा के (मखम्) यज्ञ को (न हत) मत नष्ट करो किन्तु (श्वानम्) कुत्ता आदि कर्मविघ्नकारी प्राणिवर्ग को (अप हत) हटाओ।
अर्थात् यजमान को चाहिये कि अध्वर्यु आदि ऋत्विज् लोग जो सोम रस के हवन आदि कामों को करते हैं उनकी याचना की प्रतीक्षा न करें, किन्तु बिना मांगे ही श्रद्धा और योग्यतानुसार दक्षिणा दे। और बिना दक्षिणा के यज्ञ नष्ट न करे। लोक में भी (बिना दक्षिणा यज्ञ हत = नष्ट है) इत्यादि कहावतों का मूल ऐसे ही जान पड़ते हैं।
Footnote
ऋ० ९। १०१। १३ में जो अन्तर है वह संस्कृतभाष्य में देखिये॥