Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 551

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- रेभसूनू काश्यपौ Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
आ꣡ ह꣢र्य꣣ता꣡य꣢ धृ꣣ष्ण꣢वे꣣ ध꣡नु꣢ष्टन्वन्ति꣣ पौ꣡ꣳस्य꣢म् । शु꣣क्रा꣢꣫ वि य꣣न्त्य꣡सु꣢राय नि꣣र्णि꣡जे꣢ वि꣣पा꣡मग्रे꣢꣯ मही꣣यु꣡वः꣢ ॥५५१॥

आ꣢ । ह꣣र्यता꣡य꣢ । धृ꣣ष्ण꣡वे꣢ । ध꣡नुः꣢꣯ । त꣣न्वन्ति । पौँ꣡स्य꣢꣯म् । शु꣣क्राः꣢ । वि । य꣣न्ति । अ꣡सु꣢꣯राय । अ । सु꣣राय । निर्णि꣡जे꣢ । निः꣣ । नि꣡जे꣢꣯ । वि꣣पा꣢म् । अ꣡ग्रे꣢꣯ । म꣣हीयु꣡वः꣢ ॥५५१॥

Mantra without Swara
आ हर्यताय धृष्णवे धनुष्टन्वन्ति पौꣳस्यम् । शुक्रा वि यन्त्यसुराय निर्णिजे विपामग्रे महीयुवः ॥

आ । हर्यताय । धृष्णवे । धनुः । तन्वन्ति । पौँस्यम् । शुक्राः । वि । यन्ति । असुराय । अ । सुराय । निर्णिजे । निः । निजे । विपाम् । अग्रे । महीयुवः ॥५५१॥

Samveda - Mantra Number : 551
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 8;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
पूर्वोक्त सोमसेवी धीर (शुक्राः) वीर्यवान् ब्रह्मचर्यबलयुक्त मनुष्य (आहर्यताय, धृष्णवे, असुराय) आक्रमण करते हुए, धृष्ट, असुर = पराई हानि और स्वार्थसाधन में तत्पर पुरुष के लिये (पौंस्यम धनुः) पौरुषयुक्त धनुष् (तन्वति) चढ़ाते हैं। (महीयुवः) विजय से पृथिवी को चाहने वाले वे (विपाम्) विद्वानों के (अग्र) आगे वर्तमान हुए (निर्णिजे) अपने रूप की रक्षा के लिये (वियन्ति) लड़ते हैं।
यद्यपि पूर्वोक्त प्रकार के सौम्य पुरुष सबका प्रियाचरण करते हैं, परन्तु जो कोई दुष्ट घृष्ट उन पर आक्रमण करे तो अपने स्वरूप की रक्षा के लिये उनसे युद्ध करने में समर्थ होते हैं और विद्वानों के आगे होकर अपनी रक्षा और दुष्टों का दमन कर सकते हैं।
Footnote
निघण्टु २। १४॥ ३। ७॥ ३। १५ के प्रमाण और ऋ० ९। ९९। १ के पाठभेद संस्कृतभाष्य में देखिये। सायणाचार्य ने ऋग्वेद के पाठ (वयन्ति) की ही व्याख्या यहां (वियन्ति) पाठ होते हुए भी भ्रान्ति से की है॥