Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 55

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
दे꣣वो꣡ वो꣢ द्रविणो꣣दाः꣢ पू꣣र्णां꣡ वि꣢वष्ट्वा꣣सि꣡च꣢म् । उ꣡द्वा꣢ सि꣣ञ्च꣢ध्व꣣मु꣡प꣢ वा पृणध्व꣣मा꣡दिद्वो꣢꣯ दे꣣व꣡ ओ꣢हते ॥५५॥

दे꣣वः꣢ । वः꣣ । द्रविणोदाः꣢ । द्र꣣विणः । दाः꣢ । पू꣣र्णा꣢म् । वि꣣वष्टु । आसि꣡च꣢म् । आ꣣ । सि꣡च꣢꣯म् । उत् । वा꣣ । सिञ्च꣡ध्व꣢म् । उ꣡प꣢꣯ । वा꣣ । पृणध्वम् । आ꣢त् । इत् । वः꣣ । देवः꣢ । ओ꣣हते ॥५५॥

Mantra without Swara
देवो वो द्रविणोदाः पूर्णां विवष्ट्वासिचम् । उद्वा सिञ्चध्वमुप वा पृणध्वमादिद्वो देव ओहते ॥

देवः । वः । द्रविणोदाः । द्रविणः । दाः । पूर्णाम् । विवष्टु । आसिचम् । आ । सिचम् । उत् । वा । सिञ्चध्वम् । उप । वा । पृणध्वम् । आत् । इत् । वः । देवः । ओहते ॥५५॥

Samveda - Mantra Number : 55
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(द्रविणोदाः, देवः) अग्नि देवता (वः) तुम्हारी (पूर्णाम्, आसिचम्) भरी हुई, स्रुच् को (विवष्टु) चाहता है। तुम (उप-पृणध्वं वा) भरो और (उत्—सिञ्चध्वं वा) ऊपर, छोड़ो (देवः) अग्नि (वः) तुम्हारी आहुति को (आत्—इत्) तत्काल, ही (ओहते) पहुँचाता है।
अर्थात् परमात्मा विधिवाक्य द्वारा उपदेश करता है कि—अग्नि तुम्हारी भरी हुई स्रुच् को चाहता है, तुम भरो और अग्नि में सींचो अर्थात् छोड़ो। अग्नि में सींचा हुआ घृतादि व्यर्थ नहीं होता। यह बताने के लिए कहा है कि वह अग्नि तत्काल वायु आदि देवों को पहुंचा देता है। “वा” शब्द समुच्चयार्थ है अर्थात् भरो छोड़ो, भरो छोड़ो, तार-वार बांध दो। निघं० २। ९ और २। १० में द्रविण नाम धन और बल का है, अग्नि से ही शरीरों में बल है यह तो सब जानते ही हैं तथा अग्नि का बल अग्नियानों को देखने से जाना जा सकता है और उसी से धन की प्राप्ति भी देखी जा सकती है। इसीलिये निरुक्त ८। २ में भी धन और बल का दाता होने से अग्नि का नाम ‘द्रविणोदा’ ठहराया है। निरुक्त का प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये जिसका तात्पर्य यह है कि ‘शाकपूणि’ आचार्य कहते हैं कि यही अग्नि ‘द्रविणोदा’ है, क्योंकि अग्नि के ही सूक्तों में ‘द्रविणोदा’ की चर्चा है जैसा कि—‘देवा अग्निं धारयन् द्रविणोदाम्’ यह वेदवचन है इत्यादि। अग्नि में चाहना ऐसे ही समझिये जैसा—भीत गिरना चाहती है, वा यह रोगी मरना चाहता है, अर्थात् अब मरा, इत्यादि। ‘विवष्टु’ के स्थान में ‘विवष्टि’ ऐसा साक्षात् पाठ भी किन्हीं पुस्तकों में पाया जाता है।
Footnote
ऋग्वेद ७।१६।११ में भी ऐसी ही ऋचा है॥