Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 545

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अन्धीगुः श्यावाश्विः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
पु꣣रो꣡जि꣢ती वो꣣ अ꣡न्ध꣢सः सु꣣ता꣡य꣢ मादयि꣣त्न꣡वे꣢ । अ꣢प꣣ श्वा꣡न꣢ꣳश्नथिष्टन꣣ स꣡खा꣢यो दीर्घजि꣣꣬ह्व्य꣢꣯म् ॥५४५॥

पु꣣रो꣡जि꣢ती । पु꣣रः꣢ । जि꣣ती । वः । अ꣡न्ध꣢꣯सः । सु꣣ता꣡य꣢ । मा꣣दयित्न꣡वे꣢ । अ꣡प꣢꣯ । श्वा꣡न꣢꣯म् । श्न꣣थिष्टन । श्नथिष्ट । न । स꣡खा꣢꣯यः । स । खा꣣यः । दीर्घजिह्व्य꣢꣯म् । दी꣣र्घ । जिह्व्य꣢꣯म् । ॥५४५॥

Mantra without Swara
पुरोजिती वो अन्धसः सुताय मादयित्नवे । अप श्वानꣳश्नथिष्टन सखायो दीर्घजिह्व्यम् ॥

पुरोजिती । पुरः । जिती । वः । अन्धसः । सुताय । मादयित्नवे । अप । श्वानम् । श्नथिष्टन । श्नथिष्ट । न । सखायः । स । खायः । दीर्घजिह्व्यम् । दीर्घ । जिह्व्यम् । ॥५४५॥

Samveda - Mantra Number : 545
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 8;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(सखायः) हे मित्रो ! (वः) तुम्हारे (मादयित्नवे) हर्ष वा आनन्ददायक (पुरोजिती) आगे जय कराने वाले (सुताय) सम्पादित सोम रूपी (अन्धसः) तृप्तिकारक अन्न के लिये अर्थात् उसकी रक्षार्थ (दीर्घजिह्वयम् श्वानम्) लम्बी जीभ वाले कुत्ते को (अप श्नथिष्टन) भगाओ॥
यज्ञस्थान एक पवित्र स्थान है, उसमें रक्खे हुए सोमादि उत्तम हव्य पदार्थों को कुत्ते और उससे उपलक्षित अन्य लम्बी जीभ वाले जो जीभ निकाल कर पानी पीते हैं उन मांसाहारादि परायी हानि करने वाले जन्तुनों से अवश्य बचना चाहिये। इसी को मूल मानकर लोक में भी कहावत है कि “कुत्ती जैसे यज्ञमण्डप के योग्य नहीं” इत्यादि॥ “इन ऋचाओं का ज्योतिष्टोम नामक यज्ञ में विनियोग है” ऐसा विवरणकार लिखते हैं। परमेश्वर विषयक अर्थ में भी श्वन् शब्द से पराये अनिष्ट करने वाले क्रोधादि से अपने ध्यानामृत की रक्षा करना आवश्यक है, जो कि आत्मा की तृप्ति का हेतु ध्यानामृतरूप धन्न है॥
Footnote
उणादि १। १५९ अष्टाध्यायी ७।१२।३९ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥
ऋ० ९। १०१। १ में भी॥