Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 542

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- पराशरः शाक्त्यः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
म꣣ह꣡त्तत्सोमो꣢꣯ महि꣣ष꣡श्च꣢कारा꣣पां꣡ यद्गर्भोऽवृ꣢꣯णीत दे꣣वा꣢न् । अ꣡द꣢धा꣣दि꣢न्द्रे꣣ प꣡व꣢मान꣣ ओ꣡जोऽज꣢꣯नय꣣त्सू꣢र्ये꣣ ज्यो꣢ति꣣रि꣡न्दुः꣢ ॥५४२॥

म꣣ह꣢त् । तत् । सो꣡मः꣢꣯ । म꣣हिषः꣢ । च꣣कार । अ꣣पा꣢म् । यत् । ग꣡र्भः꣢꣯ । अ꣡वृ꣢꣯णीत । दे꣣वा꣢न् । अ꣡द꣢꣯धात् । इ꣡न्द्रे꣢꣯ । प꣡व꣢꣯मानः । ओ꣡जः꣢꣯ । अ꣡ज꣢꣯नयत् । सू꣡र्ये꣢꣯ । ज्यो꣡तिः꣢꣯ । इ꣡न्दुः꣢꣯ ॥५४२॥

Mantra without Swara
महत्तत्सोमो महिषश्चकारापां यद्गर्भोऽवृणीत देवान् । अदधादिन्द्रे पवमान ओजोऽजनयत्सूर्ये ज्योतिरिन्दुः ॥

महत् । तत् । सोमः । महिषः । चकार । अपाम् । यत् । गर्भः । अवृणीत । देवान् । अदधात् । इन्द्रे । पवमानः । ओजः । अजनयत् । सूर्ये । ज्योतिः । इन्दुः ॥५४२॥

Samveda - Mantra Number : 542
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 7;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(सोमः) सोमरस या अमृत परमात्मा (यत्) जो कि (अपांगर्भः) जलों का ग्राहक वा कर्मों का ग्राहक (देवान् अवृणीत) वायु आदि देवतों, वा विद्वानों वा इन्द्रियों का वरण करता है, (महिषः) गुणों से महान् सोम (तत्-महत्) यह बड़ा काम (चकार) करता है। तथा (पवमानः) शुद्धि का हेतु सोम (इन्द्रे) बिजुली वा आत्मा में (ओजः) बल को (अदधात्) धारण करता है और वही (इन्दुः) सोम (सूर्ये) आदित्यमण्डल में (ज्योतिः) प्रकाश को (अजनयत) उत्पन्न करता है॥
परमात्मा यह सब करता है, इसमें तो विवाद ही नहीं, परन्तु सोम मी किसी अंश तक जलों का ग्राहक, वायु आदि देवों का वा पान करने से इन्द्रियों का वरण करने वाला, वृष्टिकारक, विद्युत्तत्त्व वा आत्मा में बल का धारण करने वाला और सूर्य की किरणों में फैलकर प्रकाश का उत्पन्न करने वाला कहा जा सकता है।
Footnote
निरुक्त के परिशिष्टकार २। १७ में कहते हैं कि यहाँ इन्दु = आत्मा वा आदित्य का नाम है। और निघण्टु २। ३॥ ३। ३ के प्रमाण भी संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋ० ९। ९७। ४१ में भी॥