Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 540

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- मन्युर्वासिष्ठः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
इ꣡न्दु꣢र्वा꣣जी꣡ प꣢वते꣣ गो꣡न्यो꣢घा꣣ इ꣢न्द्रे꣣ सो꣢मः꣣ स꣢ह꣣ इ꣢न्व꣣न्म꣡दा꣢य । ह꣢न्ति꣣ र꣢क्षो꣣ बा꣡ध꣢ते꣣ प꣡र्यरा꣢꣯तिं꣣ व꣡रि꣢वस्कृ꣣ण्व꣢न्वृ꣣ज꣡न꣢स्य꣣ रा꣡जा꣢ ॥५४०॥

इ꣡न्दुः꣢꣯ । वा꣣जी꣢ । प꣣वते । गो꣡न्यो꣢꣯घाः । गो । न्यो꣣घाः । इ꣡न्द्रे꣢꣯ । सो꣡मः꣢꣯ । स꣡हः꣢꣯ । इ꣡न्व꣢꣯न् । म꣡दा꣢꣯य । ह꣡न्ति꣢꣯ । र꣡क्षः꣢꣯ । बा꣡ध꣢꣯ते । प꣡रि꣢꣯ । अ꣡रा꣢꣯तिम् । अ । रा꣣तिम् । व꣡रि꣢꣯वः । कृ꣣ण्व꣢न् । वृ꣣ज꣡न꣢स्य । रा꣡जा꣢꣯ ॥५४०॥

Mantra without Swara
इन्दुर्वाजी पवते गोन्योघा इन्द्रे सोमः सह इन्वन्मदाय । हन्ति रक्षो बाधते पर्यरातिं वरिवस्कृण्वन्वृजनस्य राजा ॥

इन्दुः । वाजी । पवते । गोन्योघाः । गो । न्योघाः । इन्द्रे । सोमः । सहः । इन्वन् । मदाय । हन्ति । रक्षः । बाधते । परि । अरातिम् । अ । रातिम् । वरिवः । कृण्वन् । वृजनस्य । राजा ॥५४०॥

Samveda - Mantra Number : 540
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 7;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(इन्दुः) चूने वा टपकने के स्वभाव वाला (वाजी) बलवान् (गोन्योधाः) इन्द्रियों में नितरां बल पुरुषार्थ हो जिसका, ऐसा (सोमः) सोमरस (इन्द्रे) इन्द्रियों के अधिष्ठाता अन्तःकरण में (सहः) बल को (इन्वन्) पहुँचाता हुंद्रा, यद्वा, इन्द्र = वृष्टि के कर्ता में बल पहुँचाता हुआ (पवते) चूता टपकता वा वर्षता है और (रक्षः हन्ति) राक्षसगण का हननकर्त्ता तथा (अरातिम्) शत्रु का (परिबाधते) सर्वतः संहार करता है। ऐसा सोम (वरिवः) श्रेष्ठ घन को (कृण्वन्) उत्पन्न करना हुआ (वृतजनस्य) बल वा सेना का (राजा) ऐश्वर्यकारी है॥
अर्थात् सोमरस के हवन से इन्द्र वृष्टि करता और मेघों का हनन कर के धान्यादि घन को उत्पन्न करता है और सोमरस के सेवन से शरीर और मन को बल प्राप्त होता है, जिसमे शत्रुओं को जीत कर राज्यादि ऐश्वर्य प्राप्त होते हैं॥
Footnote
उणादि १।१२ निघण्टु २। १४॥ २॥ ९॥ २॥ २१ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ‘गोन्योधाः’ पद में हमारे विचार में तो ओजस् का ओघस् है। ज का घ वर्ण व्यत्यय मे हुआ है। परन्तु सायणाचार्य ओघ शब्द अकारान्त की व्याख्या करते हैं, उसमें दीर्घ पाठ विचारणीय ही रह जाता है। और श्री सत्यव्रत सामश्रमी जी कहते हैं कि—‘गोनी’ शब्द महाभाष्य के पस्पशाह्निक में गमनशील के अर्थ में अपभ्रंश है ऐसा पतञ्जलि ने लिखा है उसमें ‘ओघ’ के स्थान में ‘ओघाः’ पाठ फिर विचारणीय ही रह जाता है॥ सायणाचार्य ने (अरातिः) ऐसा ऋग्वेद ९। ९७। १० का पाठ है, उसी की व्याख्या यहाँ सामवेद में (अरातिम्) पाठ होने पर भी की है॥