Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 54

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- कण्वो घौरः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
नि꣡ त्वाम꣢꣯ग्ने꣣ म꣡नु꣢र्दधे꣣ ज्यो꣢ति꣣र्ज꣡ना꣢य꣣ श꣡श्व꣢ते । दी꣣दे꣢थ꣣ क꣡ण्व꣢ ऋ꣣त꣡जा꣢त उक्षि꣣तो꣡ यं न꣢꣯म꣣स्य꣡न्ति꣢ कृ꣣ष्ट꣡यः꣢ ॥५४॥

नि꣢ । त्वाम् । अ꣣ग्ने । म꣡नुः꣢꣯ । द꣣धे । ज्यो꣡तिः꣢꣯ । ज꣡ना꣢꣯य । श꣡श्व꣢꣯ते । दी꣣दे꣡थ꣢ । क꣡ण्वे꣢꣯ । ऋ꣣त꣡जा꣢तः । ऋ꣣त । जा꣣तः । उक्षितः꣢ । यम् । न꣣मस्य꣡न्ति꣢ । कृ꣣ष्ट꣡यः꣢ ॥५४॥

Mantra without Swara
नि त्वामग्ने मनुर्दधे ज्योतिर्जनाय शश्वते । दीदेथ कण्व ऋतजात उक्षितो यं नमस्यन्ति कृष्टयः ॥

नि । त्वाम् । अग्ने । मनुः । दधे । ज्योतिः । जनाय । शश्वते । दीदेथ । कण्वे । ऋतजातः । ऋत । जातः । उक्षितः । यम् । नमस्यन्ति । कृष्टयः ॥५४॥

Samveda - Mantra Number : 54
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(अग्ने) हे प्रकाशस्वरूप ! परमात्मन् ! (मनुः) मैं मननशील मनुष्य (शश्वते, जनाय) सनातन, पुरुष के लिए अर्थात् आपकी प्राप्ति के लिए (त्वाम्) आप (ज्योतिः) ज्योतिःस्वरूप को (नि-दधे) नितरां ध्यान करता हूं। इससे आप (कण्वे) मुझ मेधावी में (दीदेथ) प्रकाश कीजिए। जिस से मैं (ऋतजातः) सत्य वेद से प्रसिद्ध (उक्षितः) महान् [होऊँ] (यम्) जिस मुझको (कृष्टयः) मनुष्य लोग (नमस्यन्ति) सत्कृत करते हैं वा करें॥
अर्थात् हे दयालु ! भगवन् ! मैं विचार और ध्यान में परायण योगी, आपका ध्यान करता हूँ। आप ज्योतिःस्वरूप हैं, कृपया मुझे ज्योति दीजिए। जिससे मैं मेघावी, वेदपारंगत, आपकी ज्योति से ज्योतिष्मान्, महात्मा और मनुष्यों से नमस्करणीय होऊँ॥
भौतिक पक्ष में— (अग्ने) अग्ने ! (मनुः) मैं मननशील यजमान (शश्वते, जनाय) सनातन प्राणिमात्र के लिए अर्थात् प्राणिमात्र के उपकारार्थ (त्वाम्) तुझे (ज्योतिः) ज्योतिष्मान् को (नि-दधे) स्थापित करता हूँ। मैं (ऋतजातः) धन में प्रसिद्ध (उक्षितः) महान् होऊँ (यम्) जिसे (कृष्टयः) मनुष्य (नमस्यन्ति) सत्कृत करते हैं वा करें।
अर्थात् हम यज्ञकर्त्ता लोगों को शिल्प वा यज्ञ में अग्नि का स्थापन करना चाहिये, जिससे प्राणिमात्र का उपकार हो, और हम उसके तेज से तेजस्वी, महात्मा, धनी और नमस्करणीय हो जावें। यथार्थ में यज्ञ और शिल्पद्वारा यह कार्य सिद्ध हो सकता है॥
Footnote
निघं० ५। ६॥ १। १६॥ ३। १५॥ ३। १०॥ २। १०॥ २। ३॥ उणादि १। १० के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिए। मनु और कण्व शब्द से किसी ऋषिविशेष का नाम न समझना चाहिए। क्योंकि निघण्टु के विरुद्ध होने, वेद के अनादि और यौगिक अर्थ की प्रधानता होने से। किन्तु मन्त्र में आए हुए मेधावी के वाचक “कण्व” शब्द को देखकर ही इस ऋचा के द्रष्टा ने अपना नाम भी कण्व रक्खा, ऐसा समझना चाहिए॥ ऋग्वेद १।३६।१९। में भी ऐसा पाठ है॥