Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 537

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- कर्णश्रुद्वासिष्ठः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
त꣢क्ष꣣द्य꣢दी꣣ म꣡न꣢सो꣣ वे꣡न꣢तो꣣ वा꣡ग्ज्येष्ठ꣢꣯स्य꣣ ध꣡र्मं꣢ द्यु꣣क्षो꣡रनी꣢꣯के । आ꣡दी꣢माय꣣न्व꣢र꣣मा꣡ वा꣢वशा꣣ना꣢꣫ जुष्टं꣣ प꣡तिं꣢ क꣣ल꣢शे꣣ गा꣢व꣣ इ꣡न्दु꣢म् ॥५३७॥

त꣡क्ष꣢꣯त् । य꣡दि꣢꣯ । म꣡न꣢꣯सः । वे꣡न꣢꣯तः । वाक् । ज्ये꣡ष्ठ꣢꣯स्य । ध꣡र्म꣢꣯न् । द्यु꣣क्षोः꣢ । द्यु꣣ । क्षोः꣢ । अ꣡नी꣢꣯के । आत् । ई꣣म् । आयन् । व꣡र꣢꣯म् । आ । वा꣣वशानाः꣢ । जु꣡ष्ट꣢꣯म् । प꣡ति꣢꣯म् । क꣣ल꣡शे꣢ । गा꣡वः꣢꣯ । इ꣡न्दु꣢꣯म् ॥५३७॥

Mantra without Swara
तक्षद्यदी मनसो वेनतो वाग्ज्येष्ठस्य धर्मं द्युक्षोरनीके । आदीमायन्वरमा वावशाना जुष्टं पतिं कलशे गाव इन्दुम् ॥

तक्षत् । यदि । मनसः । वेनतः । वाक् । ज्येष्ठस्य । धर्मन् । द्युक्षोः । द्यु । क्षोः । अनीके । आत् । ईम् । आयन् । वरम् । आ । वावशानाः । जुष्टम् । पतिम् । कलशे । गावः । इन्दुम् ॥५३७॥

Samveda - Mantra Number : 537
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 7;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(यदि) जब कि (मनसः) प्रशंसा करने वाले (वेनतः) कामना करते हुए की (वाक्) प्रशंसा वाली वाणी (धर्मन्) धर्म अर्थात् यज्ञ में (ज्येष्ठस्य) बड़े श्रेष्ठ (द्युक्षोः) प्रकाशमान तेज वाले सवन के (अनीके) मुख्य समय में (तक्षत्) घड़ती है (आत्) तभी (कलशे) कलश में स्थित (ईम) इस (जुष्टम्) प्रीतिपात्र (पतिम्) मर्त्ता के तुल्य (वरम्) वरणीय (इन्दुम्) सोम को (आवावशानाः) सर्वतः कामना करती हुई सी (गावः) किरणें (आयन्) प्राप्त होती है॥
यद्यपि यज्ञ के द्रोणकलश में स्थापित सोमरस का जब अग्नि में होम किया जाए, तब उस सोम का सम्पर्क किरणों से होने, परन्तु जितने सवन का आरम्भ ही होता है और सोमरस द्रोणकलश में ही रखा रहता है और प्रशंसा करने वाले याज्ञिक पुरुष की वाणी वेदमन्त्रों से उसका वर्णन ही करती है, इतने ही किरणें मानो कोई स्त्रियें अपने प्यारे पति से स्पर्श करती हों, ऐसी कामना सी करती हुईं, झट द्रोणकलश स्थित सोमरस से स्पर्श करती है।
Footnote
अष्टाध्यायी ६। ३। १३६॥ ७। १। ३६ निघण्टु २। ६। ३। १४ निरुक्त २। ६ के प्रमाण और ऋ० ९। ९७। २२ के पाठ का भेद संस्कृतमाध्य में देखिये॥