Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 534

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- पराशरः शाक्त्यः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
प्र꣢ ते꣣ धा꣢रा꣣ म꣡धु꣢मतीरसृग्र꣣न्वा꣢रं꣣ य꣢त्पू꣣तो꣢ अ꣣त्ये꣡ष्यव्य꣢꣯म् । प꣡व꣢मान꣣ प꣡व꣢से꣣ धा꣡म꣢ गो꣡नां꣢ ज꣣न꣢य꣣न्त्सू꣡र्य꣢मपिन्वो अ꣣र्कैः꣢ ॥५३४॥

प्र꣢ । ते꣣ । धा꣡राः꣢꣯ । म꣡धु꣢꣯मतीः । अ꣣सृग्रन् । वा꣡र꣢꣯म् । यत् । पू꣣तः꣢ । अ꣣त्ये꣡षि꣢ । अ꣣ति । ए꣡षि꣢꣯ । अ꣡व्य꣢꣯म् । प꣡व꣢꣯मान । प꣡व꣢꣯से । धा꣡म꣢꣯ । गो꣡ना꣢꣯म् । ज꣣न꣡य꣢न् । सू꣡र्य꣢꣯म् । अ꣣पिन्वः । अर्कैः꣢ ॥५३४॥

Mantra without Swara
प्र ते धारा मधुमतीरसृग्रन्वारं यत्पूतो अत्येष्यव्यम् । पवमान पवसे धाम गोनां जनयन्त्सूर्यमपिन्वो अर्कैः ॥

प्र । ते । धाराः । मधुमतीः । असृग्रन् । वारम् । यत् । पूतः । अत्येषि । अति । एषि । अव्यम् । पवमान । पवसे । धाम । गोनाम् । जनयन् । सूर्यम् । अपिन्वः । अर्कैः ॥५३४॥

Samveda - Mantra Number : 534
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 7;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(पवमान) सोम ! (मधुमतीः) मधुरतायुक्त (ते) तेरी (धाराः) धारें तब (माऽसृग्रन्) छूटती हैं (यत्) जब कि (पूतः) स्वच्छ किया हुआ (अव्यं वारम्) ऊन के दशापवित्र को (अत्येषि) लांघकर अग्नि में जाता है (गोनां धाम) किरणों के पुञ्ज को (जनयन्) उत्पन्न करता हुआ (अर्कैः) अपने तेजों से (सूर्यम्) सूर्य को (अपिन्वः) आप्यायित करता और (पवसे) गगनमण्डल को जाता है।
सोमरस को स्वच्छ करके दशापवित्र से लेकर अग्नि में होम करने से उसकी मधुर धारें छूटतों और आकाशमण्डल में अपने तेजोयुक्त सूक्ष्म अवयवों से सूर्य की किरणों को बसाती हुई वृष्टि और शुद्धि करती हैं यह तात्पर्य है।
Footnote
अष्टाध्यायी ७।१।५७ का प्रमाण और ऋ० ६। ९७। ३१ का पाठभेद संस्कृतभाष्य में देखिये॥