Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 532

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- प्रतर्दनो दैवोदासिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
प꣡व꣢स्व सोम꣣ म꣡धु꣢माꣳ ऋ꣣ता꣢वा꣣पो꣡ वसा꣢꣯नो꣣ अ꣢धि꣣ सा꣢नो꣣ अ꣡व्ये꣢ । अ꣢व꣣ द्रो꣡णा꣢नि घृ꣣त꣡व꣢न्ति रोह म꣣दि꣡न्त꣢मो मत्स꣣र꣡ इ꣢न्द्र꣣पा꣡नः꣢ ॥५३२॥

प꣡व꣢꣯स्व । सो꣣म । म꣡धु꣢꣯मान् । ऋ꣣ता꣡वा꣢ । अ꣣पः꣢ । व꣡सा꣢꣯नः । अ꣡धि꣢꣯ । सा꣡नौ꣢꣯ । अ꣡व्ये꣢꣯ । अ꣡व꣢꣯ । द्रो꣡णा꣢꣯नि । घृ꣣त꣡व꣢न्ति । रो꣣ह । मदि꣡न्त꣢मः । म꣣त्सरः꣢ । इ꣣न्द्रपा꣡नः꣢ । इ꣣न्द्र । पा꣡नः꣢꣯ ॥५३२॥

Mantra without Swara
पवस्व सोम मधुमाꣳ ऋतावापो वसानो अधि सानो अव्ये । अव द्रोणानि घृतवन्ति रोह मदिन्तमो मत्सर इन्द्रपानः ॥

पवस्व । सोम । मधुमान् । ऋतावा । अपः । वसानः । अधि । सानौ । अव्ये । अव । द्रोणानि । घृतवन्ति । रोह । मदिन्तमः । मत्सरः । इन्द्रपानः । इन्द्र । पानः ॥५३२॥

Samveda - Mantra Number : 532
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(सोम) सोमरस ! (अपः वसानः) जलों में मिला हुआ (मधुमान्) मधुर रसयुक्त (ऋतावा) यज्ञवाला (अव्ये) ऊर्णामय दशापवित्र पर (अधिसानः) अभिषेक किया हुआ (मत्सरः) हृष्टिपुष्टियुक्त और (मदिन्तम) अतिहृष्टिपुष्टिकारक (इन्द्रपानः) इन्द्र = सूर्य विद्युत् वा राजा यजमान के पान योग्य (पवस्व) प्राप्त हो, तथा (घृतवन्ति) जल वाले (द्रोणानि) द्रोणकलशों में (अव रोह) रक्खा जाए॥
सोमरस के सम्पादन करने वालों को उसमें मिठाई मिलाकर जलतुल्य गीला करके, ऊन के दशापवित्र पर द्रोणकलशों में भरकर, रख के यज्ञ में वर्त्तना चाहिए। वह हृष्टि पुष्टि स्वादु से युक्त, हुष्टि पुष्टि स्वादु बल आदि देता है॥
Footnote
निघण्टु १। १३ का प्रमाण और ऋ० ९। ९६। १३ का पाठभेद संस्कृतभाष्य में देखिये॥