Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 53

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- विश्वामित्रो गाथिनः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
का꣡य꣢मानो व꣣ना꣢꣫ त्वं यन्मा꣣तॄ꣡रज꣢꣯गन्न꣣पः꣢ । न꣡ तत्ते꣢꣯ अग्ने प्र꣣मृ꣡षे꣢ नि꣣व꣡र्त꣢नं꣣ य꣢द्दू꣣रे꣢꣫ सन्नि꣣हा꣡भुवः꣢ ॥५३॥

का꣡य꣢꣯मानः । व꣣ना꣢ । त्वम् । यत् । मा꣣तॄः꣢ । अ꣡ज꣢꣯गन् । अ꣣पः꣢ । न । तत् । ते꣣ । अग्ने । प्रमृ꣡षे꣢ । प्र꣣ । मृ꣡षे꣢꣯ । नि꣣ । व꣡र्त्त꣢꣯नम् । यत् । दू꣣रे꣢ । दुः꣣ । ए꣢ । सन् । इ꣣ह꣢ । अ꣡भु꣢꣯वः ॥५३॥

Mantra without Swara
कायमानो वना त्वं यन्मातॄरजगन्नपः । न तत्ते अग्ने प्रमृषे निवर्तनं यद्दूरे सन्निहाभुवः ॥

कायमानः । वना । त्वम् । यत् । मातॄः । अजगन् । अपः । न । तत् । ते । अग्ने । प्रमृषे । प्र । मृषे । नि । वर्त्तनम् । यत् । दूरे । दुः । ए । सन् । इह । अभुवः ॥५३॥

Samveda - Mantra Number : 53
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(अग्ने) हे अग्ने ! (यत्) जो कि (त्वम्) तू (बना) किरणों को (कायमानः) चाहता (सन्) हुआ (अपः) व्यापक बिजुलीरूप (मातृः) माताओं को (अजगन्) प्राप्त होता है [उससे जाना जाता है कि] (यत्) जो (इह) यहां पृथिवी आदि पर (दूरे, आभुवः) तू दूर हो गया (तत्, निवत्तनम्) वह, दूर होना (ते) तुझे (न, प्र मृषे) नहीं अच्छा लगता॥
भाव यह है कि कार्यरूप अग्नि जो दैवोदासादि संज्ञक है और पृथिव्यादि से प्रतिक्षण निकलकर दिव् लोक की ओर जाता है, वह मानो अपने कारणरूप बिजली में ऐसे जाता है जैसे बालक उत्पन्न होकर फिर अपनी माता की ओर जाता है। ऐसे ही वह अग्नि भी कार्यरूप में उत्पन्न होते ही फिर कारणरूप विद्युत की ओर दौड़ता है और यहाँ माता [कारण] से दूर रहना इसे अच्छा नहीं लगता।
Footnote
निरुक्त में भी इसका यही व्याख्यान किया है। निरुक्त ४।१४॥ निघं० १। ५॥ २। १४॥ ५। ३ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ “प्रभवः” ऐसा भी पाठान्तर है। तथा ऐसी ही ऋचा ऋग्वेद ३। ९। २ में भी है॥