Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 529

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- पराशरः शाक्त्यः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
अ꣡क्रा꣢न्त्समु꣣द्रः꣡ प्र꣢थ꣣मे꣡ विध꣢꣯र्मन् ज꣣न꣡य꣢न्प्र꣣जा꣡ भुव꣢꣯नस्य गो꣣पाः꣢ । वृ꣡षा꣢ प꣣वि꣢त्रे꣣ अ꣢धि꣣ सा꣢नो꣣ अ꣡व्ये꣢ बृ꣣ह꣡त्सोमो꣢꣯ वावृधे स्वा꣣नो꣡ अद्रिः꣢꣯ ॥५२९॥

अ꣡क्रा꣢꣯न् । स꣣मुद्रः꣢ । स꣣म् । उद्रः꣢ । प्र꣣थमे꣢ । वि꣡ध꣢꣯र्मन् । वि । ध꣣र्मन् । जन꣡य꣢न् । प्र꣣जाः꣢ । प्र꣣ । जाः꣢ । भु꣡व꣢꣯नस्य । गो꣣पाः꣢ । गो꣣ । पाः꣢ । वृ꣡षा꣢꣯ । प꣣वि꣡त्रे꣢ । अ꣡धि꣢꣯ । सा꣡नौ꣢꣯ । अ꣡व्ये꣢꣯ । बृ꣣ह꣢त् । सो꣡मः꣢꣯ । वा꣣वृधे । स्वानः꣢ । अ꣡द्रिः꣢꣯ । अ । द्रिः꣣ ॥५२९॥

Mantra without Swara
अक्रान्त्समुद्रः प्रथमे विधर्मन् जनयन्प्रजा भुवनस्य गोपाः । वृषा पवित्रे अधि सानो अव्ये बृहत्सोमो वावृधे स्वानो अद्रिः ॥

अक्रान् । समुद्रः । सम् । उद्रः । प्रथमे । विधर्मन् । वि । धर्मन् । जनयन् । प्रजाः । प्र । जाः । भुवनस्य । गोपाः । गो । पाः । वृषा । पवित्रे । अधि । सानौ । अव्ये । बृहत् । सोमः । वावृधे । स्वानः । अद्रिः । अ । द्रिः ॥५२९॥

Samveda - Mantra Number : 529
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(स्वानः) अभिषव किया हुआ (अधिसानः) अभिषेक किया जाता हुआ (सोमः) सोमरस (अव्ये) ऊन के (पवित्रे) दशापवित्र पर [स्थापित] (प्रथमे) विस्तृत (विधर्मन्) विशेष धारक यज्ञ में (अद्रिः) मेघरूप में परिणत (बृहत) बहुत (वावृधे) बढ़ता है और (भुवनस्य) पृथिव्यादि लोक की (प्रजाः) प्रजाओं को (जनयन्) अन्नोत्पत्ति करके उत्पन्न करता हुआ (गोपाः) गौ आदि पशुओं की तृणोत्पत्ति करके रक्षा करने वाला (वृषा) वर्षा करने वाला (समुद्रः) जिससे जल वर्षते हैं, वह सोमरस (अक्रान्) सर्वतः क्रान्त होता है।
ईश्वर पक्ष में—(अव्ये) पर्वत के एकान्त (पवित्रे) शुद्ध देश में (स्वानः) ध्यान से अभिषव किया जाता हुआ और (अधिसानः) अभिषेचन किया जाता हुआ (सोमः) आत्माऽऽनन्दामृत (अद्रिः) मेघ सा (बृहत्) बहुत (वावृधे) उमडता = बढ़ता है। क्योंकि (गोपाः) पृथिवी आदि लोकों का पालक (समुद्रः) जिसमें लोक लोकान्तर घूम रहे हैं, वह अमृत परमात्मा (भुवनस्य) भूलोकादि की (प्रजाःजनयन्) प्रजाओं को उत्पन्न करता हुआा (प्रथमे) विस्तृत (विधर्मन्) विशेष करके धारने वाले गगनमण्डल में (अक्रान्) सबको आक्रान्त कर रहा है। (वृषा) वह कामना पूरी करता है॥
Footnote
निरुक्त के परिशिष्टकार ने इसका व्याख्यान इस प्रकार किया है कि—आक्रमण करता है मुद्र = आदित्य जो कि वर्षा करने से प्रजा का उत्पादक और सबका राजा है। सोम पवित्र पर स्थित, वृष्टिकारक, अत्यन्त बढ़ता है। यह आधिदैविक अर्थ हुआ। अब आध्यात्मिक अर्थ यह है कि—क्रमण करता है समुद्र = आत्मा, जो बड़े आकाश में ज्ञान द्वारा सबका उत्पादक और राजा है। (उत्तरार्ध का अर्थ पूर्व के तुल्य है) निरुक्त परिशिष्ट २। १६ अष्टाध्यायी ८। २। ६४॥ निघण्टु १। १० इत्यादि के प्रमाण और ऋग्वेद ९। ९७। ४० का पाठभेद संस्कृतभाष्य में देखिये, तथा निरुक्तपरिशिष्ट में ऋग्वेदस्थ पाठ की ही व्याख्या है॥