Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 527

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- प्रतर्दनो दैवोदासिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
सो꣡मः꣢ पवते जनि꣣ता꣡ म꣢ती꣣नां꣡ ज꣢नि꣣ता꣢ दि꣣वो꣡ ज꣢नि꣣ता꣡ पृ꣢थि꣣व्याः꣢ । ज꣣निता꣡ग्नेर्ज꣢꣯नि꣣ता꣡ सूर्य꣢꣯स्य जनि꣣ते꣡न्द्र꣢स्य जनि꣣तो꣡त विष्णोः꣢꣯ ॥५२७॥

सो꣡मः꣢꣯ । प꣣वते । जनिता꣢ । म꣣तीना꣢म् । ज꣣निता꣢ । दि꣣वः꣢ । ज꣣निता꣢ । पृ꣣थिव्याः꣢ । ज꣣निता꣢ । अ꣣ग्नेः꣢ । ज꣣निता꣢ । सू꣡र्य꣢꣯स्य । ज꣣निता꣢ । इ꣡न्द्र꣢꣯स्य । ज꣣निता꣢ । उ꣣त꣢ । वि꣡ष्णोः꣢꣯ ॥५२७॥

Mantra without Swara
सोमः पवते जनिता मतीनां जनिता दिवो जनिता पृथिव्याः । जनिताग्नेर्जनिता सूर्यस्य जनितेन्द्रस्य जनितोत विष्णोः ॥

सोमः । पवते । जनिता । मतीनाम् । जनिता । दिवः । जनिता । पृथिव्याः । जनिता । अग्नेः । जनिता । सूर्यस्य । जनिता । इन्द्रस्य । जनिता । उत । विष्णोः ॥५२७॥

Samveda - Mantra Number : 527
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(सोमः) अमृत परमात्मा जो कि (मतीनां जनिता) बुद्धियों का उत्पादक (दिवो जनिता) द्युलोक का उत्पादक (पृथिव्याः जनिता) पृथिवी का उत्पादक (अग्नेर्जनिता) अग्नि का उत्पादक (सूर्यस्य जनिता) सूर्य का उत्पादक (इन्द्रस्य जनिता) विद्युत् का उत्पादक (उत) और (विष्णोः) यज्ञ का (जनिता) उत्पादक है (पवते) याज्ञिकों को प्राप्त होता है।
और विवरणकार यह अर्थ करते हैं कि—“सोमः पवते। इसका विनियोग यज्ञ के चतुर्थ दिन में है। अधियज्ञ पक्ष के अर्थ में—पर्णसोम पृथिवी आदि का उत्पन्न करने वाला कहना सम्भव है क्योंकि यज्ञ द्वारा स्थिति का हेतु है। मति, द्युलोक, अग्नि, सूर्य, इन्द्र और व्याप्ति वाले पदार्थ का भी पृथिव्यादि से रस लेकर बढ़ाने वाला होने से “सोम सबका उत्पादक है” यह अघिदैवत अर्थ हुआ। और आत्मपरक अर्थ करें तो यह होगा कि—आत्मा सोम है, जो सबमें बसा है और सब को बनाता है। भोक्ता होने से आत्मा वा उपादान कारण। भूतेन्द्रियों का उत्पादक है और दोनों (पृथिवी तथा द्युलोक) के ग्रहण से मध्यवर्ती अन्तरिक्ष का भी ग्रहण जानो औौर उन तीनों स्थानों में अग्न्यादि का भी तथा व्याप्ति वाले पदार्थ का भी”।
तथा निरुक्त के परिशिष्टकार ने यह अर्थ किया है कि “सोमः पवते० ऋचा में सोम सूर्य का नाम है क्योंकि वह उत्पादक है। वह मति = प्रकाश कारक सूर्यकिरणों, द्यु = प्रकट करने वाली सूर्य किरणों, पृथिवी = फैलाने वाली सूर्यकिरणों, अग्नि = चलने वाली सूर्यकिरणों, सूर्य = स्वीकार करने वाली सूर्यकिरणों, इन्द्र = ऐश्वर्य आकर्षण वशीकरण करने वाली सूर्य किरणों और विष्णु = व्यापने वाली सूर्यकिरणों का [उत्पादक है] यह देवता पक्ष का अर्थ हुआ। और आत्मा के पक्ष में—सोम आत्मा है क्योंकि वह भी उत्पादक है इन्द्रियादि का और सम्पूर्ण विभूतियों से विभु आत्मा है। यह आध्यात्मिक अर्थ कहा”।
Footnote
नि० प० २। १२॥ ऋ० ९। ९६। ५ में भी॥