Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 525

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- पराशरः शाक्त्यः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
ति꣣स्रो꣡ वाच꣢꣯ ईरयति꣣ प्र꣡ वह्नि꣢꣯रृ꣣त꣡स्य꣢ धी꣣तिं꣡ ब्रह्म꣢꣯णो मनी꣣षा꣢म् । गा꣡वो꣢ यन्ति꣣ गो꣡प꣢तिं पृ꣣च्छ꣡मा꣢नाः꣣ सो꣡मं꣢ यन्ति म꣣त꣡यो꣢ वावशा꣣नाः꣢ ॥५२५॥

ति꣣स्रः꣢ । वा꣡चः꣢꣯ । ई꣣रयति । प्र꣢ । व꣡ह्निः꣢꣯ । ऋ꣣त꣡स्य꣢ । धी꣣ति꣢म् । ब्र꣡ह्म꣢꣯णः । म꣣नीषा꣢म् । गा꣡वः꣢꣯ । य꣣न्ति । गो꣡प꣢꣯तिम् । गो । प꣣तिम् । पृच्छ꣡मा꣢नाः । सो꣡म꣢꣯म् । य꣣न्ति । मत꣡यः꣢ । वा꣣वशानाः꣢ ॥५२५॥

Mantra without Swara
तिस्रो वाच ईरयति प्र वह्निरृतस्य धीतिं ब्रह्मणो मनीषाम् । गावो यन्ति गोपतिं पृच्छमानाः सोमं यन्ति मतयो वावशानाः ॥

तिस्रः । वाचः । ईरयति । प्र । वह्निः । ऋतस्य । धीतिम् । ब्रह्मणः । मनीषाम् । गावः । यन्ति । गोपतिम् । गो । पतिम् । पृच्छमानाः । सोमम् । यन्ति । मतयः । वावशानाः ॥५२५॥

Samveda - Mantra Number : 525
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(वह्निः) ईश्वरदत्त ज्ञान के ले चलने वाला ऋषि (तिस्त्रः वाचः) तीन प्रकार की ऋग्, यजुः और साम लक्षणयुक्त वाणियों को (ऋतस्य धीतिम्) सत्य की धारणा और (ब्राह्मणः मनीषाम्) परमात्मा की सत्य प्रज्ञा को (प्र ईरयति) लोक में प्रचारित करता है, इस लिये (गावः) वेदवाणियें (गोपत पृच्छमानाः) वाणीपति—परमात्मा से पूछती हुई सी (यन्ति) बाहर जाती हैं अर्थात् ज्यों की त्यों प्रकाशित होती हैं, तथा (मतयः) वेदवाही ऋषियों की बुद्धियें (वावशानाः) सोमादि वेदप्रतिपादित पदार्थों की कामना करती हुई (सोनम्) सोमोपलक्षित वस्तुमात्र को (यन्ति) प्राप्त होती हैं॥
Footnote
पूर्वमन्त्र में यह कहा गया था कि ऋषि लोग प्रत्येक कल्प के आरम्भ में ईश्वर से प्रातिभासिक ज्ञान को प्राप्त हुआ करते हैं। इस मन्त्र में यह कहा जाता है कि सर्वथा ज्यों का त्यों ही परमात्मा की ओर से हृदय में प्राप्त हुआ ज्ञान जो ऋग्, यजुः और साम इन तीन प्रकार की ऋचाओं में वर्णित होता है, उसे ऋषि लोग प्रचार किया करते हैं। न्यूनाधिक कुछ नहीं। जिस प्रकार एक दूत अपने स्वामी से पूछ कर ज्यों का त्यों सन्देश ले जाता है, इसी प्रकार वेदवाणियें मानो परमात्मा से पूछकर चलती हैं। इसी लिये वेदों में प्रतिपादित सोमादि पदार्थों की यथार्थ प्राप्ति वेदवाही ऋषियों को हो जाती है, किसी प्रकार का भ्रम नहीं होता॥
यहाँ तीन प्रकार की वाणी कहने से वेदों की ऋग्वेद यजुर्वेद सामवेद इन तीन संहिताओं का ग्रहण नहीं है, प्रत्युत चारों संहिता ऋग् यजुः साम अथर्व में तीन प्रकार की ऋचा हैं। एक ऋक्, दूसरी यजुः, तीसरी साम। जैसा कि मीमांसादर्शन सूत्र २।१। ३५-३६-३७ में जैमिनि जी ने माना है कि “जिन की अर्थवश से पादव्यवस्था है वे ऋक्, जिनमें गीति हैं वे साम और शेष यजुः”॥ मीमांसा के सूत्र और निघण्टु १। ११ तथा निरुक्त परिशिष्ट और इस का अनुसरण करते हुए विवरणकार का मत संस्कृतभाष्य में देखिये। निरुक्त के परिशिष्ट की व्याख्या सी करते हुए इस प्रकार कहते हैं कि ३ वाणी ऋग् यजु साम वा सत्त्व रज तम, वा जागृत स्वप्न सुषुप्ति वृत्तियां। जल और किरणों को वहन करने—ले चलने से सूर्य को वह्नि कहा है। ऋत का अर्थ आदित्य वा ब्रह्म है। मनु के (अग्नौ प्रास्ताहुतिः०) अनुसार आदित्य आहुतियों का वाहक है। गौ शब्द का अर्थ जल वा किरण है। इसी प्रकार गोपति का अर्थ किरणपति=सूर्य है। जिससे पूछती हुई सी मति अर्थात् किरणें चलती हैं। मति नाम किरणों का इसलिये है कि उनसे प्रकाश होकर विषयों को जाना जाता है। सोम आदित्य का नाम है, जिसमें कामना करती सी किरणे फिर लौट जाती हैं। आध्यात्मिक पक्ष में वह्नि आत्मा का नाम है, क्योंकि वह वशित्वादि गुणयुक्त है। वह ३ वाणी—१ विद्या, २ बुद्धि, ३ मन को प्रेरित करता है। विद्या = महत्तत्त्व = बुद्धि अहंकार और मन = प्रधानता से भूतेन्द्रियाँ, ऋत आत्मा की धीति अर्थात् मन चाहे कर्मों को प्रेरित करते हैं। ब्रह्म—आत्मा को जो इन्द्रियों का स्वामी है, इन्द्रियाँ पूछ करके काम करती हैं। क्योंकि आत्मा के अभिप्रायानुकूल चलती हैं। इसी प्रकार सोम=आत्मा की कामना करती हुई उसी में चली जाती हैं, फिर प्रकट नहीं होतीं॥ ऋ० ९। ९७। ३४ में भी॥