Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 523

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- उशना काव्यः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
प्र꣡ तु द्र꣢꣯व꣣ प꣢रि꣣ को꣢शं꣣ नि꣡ षी꣢द꣣ नृ꣡भिः꣢ पुना꣣नो꣢ अ꣣भि꣡ वाज꣢꣯मर्ष । अ꣢श्वं꣣ न꣡ त्वा꣢ वा꣣जि꣡नं꣢ म꣣र्ज꣢य꣣न्तो꣡ऽच्छा꣣ ब꣣र्ही꣡ र꣢श꣣ना꣡भि꣢र्नयन्ति ॥५२३॥

प्र꣢ । तु । द्र꣣व । प꣡रि꣢꣯ । को꣡श꣢꣯म् । नि । सी꣣द । नृ꣡भिः꣢꣯ । पु꣣नानः꣢ । अ꣣भि꣢ । वा꣡ज꣢꣯म् । अ꣣र्ष । अ꣡श्व꣢꣯म् । न । त्वा꣣ । वाजि꣡न꣢म् । म꣣र्ज꣡य꣢न्तः । अ꣡च्छ꣢꣯ । ब꣣र्हिः꣢ । र꣣शना꣡भिः꣢ । न꣣यन्ति ॥५२३॥

Mantra without Swara
प्र तु द्रव परि कोशं नि षीद नृभिः पुनानो अभि वाजमर्ष । अश्वं न त्वा वाजिनं मर्जयन्तोऽच्छा बर्ही रशनाभिर्नयन्ति ॥

प्र । तु । द्रव । परि । कोशम् । नि । सीद । नृभिः । पुनानः । अभि । वाजम् । अर्ष । अश्वम् । न । त्वा । वाजिनम् । मर्जयन्तः । अच्छ । बर्हिः । रशनाभिः । नयन्ति ॥५२३॥

Samveda - Mantra Number : 523
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
प्रकरण से — सोम ! (नृभिः) अध्वर्यु संज्ञक मनुष्यों से (पुनानः) शोधा जाता हुआ (प्र द्रव) त्वरा से चलता है (तु) और (कोशम) द्रोणकलश को (अभि परि निषीद) व्याप=भर कर स्थित होता है। (अच्छ) भले प्रकार से (वाजिनम्) बलवान् (अश्वम्) घोड़े को (मर्जयन्तः) मार्जन करते हुए अश्वसेवक (रशनाभिः) लगामों से (न) जैसे (नयन्ति) ले जाते हैं, वैसे ही (त्वा) तुझको अध्वर्यु लोग (बर्हिः) यज्ञकुण्ड को ले जाते हैं, वह तू (वाजम्) बल को (अर्ष) प्राप्त कराता है॥
अर्थात् सोमरस को स्वच्छ सम्पन्न करके द्रोणकलशादि पात्र विशेष में स्थापित करके अध्वर्यु लोग यज्ञ को ले जाते हैं, उससे वह बलदायक होता है। जैसे कि सुशिक्षित और सुसंस्कृत घोड़ों को युद्धयज्ञ को ले जाते हैं और बल सम्पादित करते हैं (बल में उपमा है) और विजय को प्राप्त करते हैं॥
Footnote
यद्यपि मूलसंहिता में (तु) पाठ है, परन्तु न जाने किस कारण से सायणाचार्य्यादि ने (नु) की व्याख्या की है। यह भी सन्देह नहीं कर सकते कि संहिता में “तु” पाठ अशुद्ध हो और लेखक का प्रमाद हो, क्योंकि—अशनसाम, वृषौशन साम, जनस्याभीवत्तं २ सामों और त्रिष्टुबौशनसाम इन ५ सामगानों में, जीवानन्द के छापे पुस्तक और पं० गुरुदत्त के लाहौर के छापे पुस्तक और मुम्बई के छपे ऋग्वेद ९।८७।१ मन्त्रस्थपाठ में; इस प्रकार स्थानों में (तु) ही देखा जाता है, (नु) नहीं॥