Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 52

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मेधातिथि0मेध्यातिथी काण्वौ Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
अ꣢ध꣣ ज्मो꣡ अध꣢꣯ वा दि꣣वो꣡ बृ꣢ह꣣तो꣡ रो꣢च꣣ना꣡दधि꣢꣯ । अ꣣या꣡ व꣢र्धस्व त꣣꣬न्वा꣢꣯ गि꣣रा꣢꣫ ममा जा꣣ता꣡ सु꣢क्रतो पृण ॥५२॥

अ꣡ध꣢꣯ । ज्मः । अ꣡ध꣢꣯ । वा꣣ । दिवः꣢ । बृ꣣हतः꣢ । रो꣣चना꣢त् । अधि꣢꣯ । अ꣣या꣢ । व꣣र्धस्व । त꣡न्वा꣢꣯ । गि꣣रा꣢ । म꣡म꣢꣯ । आ । जा꣣ता꣢ । सु꣢क्रतो । सु । क्रतो पृण ॥५२॥

Mantra without Swara
अध ज्मो अध वा दिवो बृहतो रोचनादधि । अया वर्धस्व तन्वा गिरा ममा जाता सुक्रतो पृण ॥

अध । ज्मः । अध । वा । दिवः । बृहतः । रोचनात् । अधि । अया । वर्धस्व । तन्वा । गिरा । मम । आ । जाता । सुक्रतो । सु । क्रतो पृण ॥५२॥

Samveda - Mantra Number : 52
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(सुक्रतो) इन्द्र ! तू (ज्मः, अधि) पृथिवी से ऊपर (अध वा) और (बृहतः, रोचनात्, दिवः, अघ) बड़े प्रकाशमान, द्युलोक से, नीचे (अया) इस (तन्वा) विस्तृत शरीर से (मम, गिरा) मेरी, वाणी के साथ ही (वर्धस्व) बढ़ और (जाता) यवादि सस्यों [पैदावार] को (पूण) तृप्त वा पुष्ट कर॥
पूर्वमन्त्र में पृथिवी के ऊष्मा दैवोदास का वर्णन हो चुका है। वही अग्नि दिव्लोक को पहुँचकर इन्द्र नामक हो जाता है। और वही वर्षा का देवता अर्थात् अपनी दिव्यशक्ति से वर्षा का कर्त्ता होता है। और वही दवोदास इन्द्र पद को प्राप्त हो जाता है। इस ही कारण आग्नेय पर्व में यहाँ यह एक ऋचा इन्द्र की है। अन्यथा प्रकरणविरोध आता। इस मन्त्र में प्रार्थना है कि वह इन्द्र पृथिवी से ऊपर और दिव्लोक से नीचे उतरकर फैले और हमारी खेती को तृप्त और पुप्ट करे। प्रार्थना मन से चाहना को कहते हैं जो यहाँ लोट्लकार से विवक्षित है। बस मन में यह चाहना उत्पन्न होती है जिसे ईश्वर पूरी करे कि इन्द्र से हमारी खेती आदि की पुष्टि हो। इसलिए यह भ्रान्ति न हो कि (भौतिक) इन्द्र ही से प्रार्थना की गई है कि वह ऐसा करे। “मेरी वाणी के साथ ही” इसका तात्पर्य यह है कि हम चाहते हैं कि कहते के साथ ही अर्थात् शीघ्र परमात्मा ऐसी कृपा करे॥
Footnote
निघण्टु १। १॥ ३। ३॥ अष्टाध्यायी ६। ३। १११॥ ६। ३। १३७ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिए॥
इस मन्त्र के भाष्य में—ज्वालाप्रसाद जी ने जो “सुक्रतो” पद से “परमात्मा” अर्थ ग्रहण किया है सो भौतिक दैवोदास के प्रसङ्ग में ठीक नहीं॥ “अधय्मो” ऐसा अन्तस्थ यकार वाला पाठ भी बहुत से पुस्तकों में पाया जाता है॥
ऋग्वेद ८। १। १८ में भी ऐसा ही पाठ है॥