Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 514

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- सप्तर्षयः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
प्र꣡ सो꣢म दे꣣व꣡वी꣢तये꣣ सि꣢न्धु꣣र्न꣡ पि꣢प्ये꣣ अ꣡र्ण꣢सा । अ꣣ꣳशोः꣡ पय꣢꣯सा मदि꣣रो꣡ न जागृ꣢꣯वि꣣र꣢च्छा꣣ को꣡शं꣢ मधु꣣श्चु꣡त꣢म् ॥५१४॥

प्र꣢ । सो꣣म । दे꣡व꣢वीतये । दे꣣व꣢ । वी꣣तये । सि꣡न्धुः꣢꣯ । न । पि꣣प्ये । अ꣡र्ण꣢꣯सा । अँ꣣शोः꣢ । प꣡य꣢꣯सा । म꣣दिरः꣢ । न । जा꣡गृ꣢꣯विः । अ꣡च्छ꣢꣯ । को꣡श꣢꣯म् । म꣣धुश्चु꣡त꣢म् । म꣣धु । श्चु꣡त꣢꣯म् ॥५१४॥

Mantra without Swara
प्र सोम देववीतये सिन्धुर्न पिप्ये अर्णसा । अꣳशोः पयसा मदिरो न जागृविरच्छा कोशं मधुश्चुतम् ॥

प्र । सोम । देववीतये । देव । वीतये । सिन्धुः । न । पिप्ये । अर्णसा । अँशोः । पयसा । मदिरः । न । जागृविः । अच्छ । कोशम् । मधुश्चुतम् । मधु । श्चुतम् ॥५१४॥

Samveda - Mantra Number : 514
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(सोम) हे अमृत ! परमात्मन् ! (न) जैसे (सिन्धुः) समुद्र (अर्णसा) जल से (प्र पिप्ये) सर्वतः पूर्ण है, ऐसे ही आप (अंशोः पयसा) अमृत रूपी जल से पूर्ण हैं। अतएव कृपा करके (मदिरः) हर्षकारक (न) और (जागृविः) चेतन आप (देववीतये) विद्वान् उपासकों की तृप्ति के लिए (मधुश्चुतं कोशम्) आत्मा रूपी मधु को उपदेश द्वारा फैलाने वाले हृदयकोश को (अच्छ) प्राप्त हों॥
यद्वा — (सोम) ओषधिविशेष ! (सिन्धुर्नाऽर्णसा प्र पिप्ये) जैसे समुद्र जल से पूर्ण है, वैसे (अंशोः पयसा) लताखण्ड के रस से तू पूर्ण है, अतः (मदिरः) हर्षकारक (न) और (जागृविः) आलस्यनिवारक (देववीतये) देवयजन के लिये (मधुश्चुतं कोशम) मधु टपकाने वाले द्रोणकलश को (अच्छ) प्राप्त हो।
जिस प्रकार समुद्र सर्वतः जल से पूर्ण है, इसी प्रकार सोम सर्वतः रस से पूर्ण है। हृष्टिपुष्टिकारक, आलस्यनिवर्त्तक वह सोम देवयजन के लिये द्रोणकलशादि पात्रों में रखकर वर्त्तना चाहिये। यह तात्पर्य है॥
Footnote
आत्मा का मधु नाम से वर्णन शतपथ के १४ वें काण्ड में आया है। ऋ० ९। १०७। १२ में भी॥