Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 513

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- सप्तर्षयः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
आ꣡ सो꣢म स्वा꣣नो꣡ अद्रि꣢꣯भिस्ति꣣रो꣡ वारा꣢꣯ण्य꣣व्य꣡या꣢ । ज꣢नो꣣ न꣢ पु꣣रि꣢ च꣣꣬म्वो꣢꣯र्विश꣣द्ध꣢रिः꣣ स꣢दो꣣ व꣡ने꣢षु दध्रिषे ॥५१३॥

आ । सो꣣म । स्वानः꣢ । अ꣡द्रि꣢꣯भिः । अ । द्रि꣣भिः । तिरः꣢ । वा꣡रा꣢꣯णि । अ꣣व्य꣡या꣢ । ज꣡नः꣢꣯ । न । पु꣣रि꣢ । च꣣म्वोः꣢꣯ । वि꣣शत् । ह꣡रिः꣢꣯ । स꣡दः꣢꣯ । व꣡ने꣢꣯षु । द꣣ध्रिषे ॥५१३॥

Mantra without Swara
आ सोम स्वानो अद्रिभिस्तिरो वाराण्यव्यया । जनो न पुरि चम्वोर्विशद्धरिः सदो वनेषु दध्रिषे ॥

आ । सोम । स्वानः । अद्रिभिः । अ । द्रिभिः । तिरः । वाराणि । अव्यया । जनः । न । पुरि । चम्वोः । विशत् । हरिः । सदः । वनेषु । दध्रिषे ॥५१३॥

Samveda - Mantra Number : 513
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(अद्रिभिः) प्राणायामों से (स्वानः) साक्षात् किये जाते हुए और (अव्यया, वाराणि, तिरः) नहीं घटने वाली, सूर्य की किरणों को, तिरस्कृत [मात] करते हुए (हरिः) सब का ग्रहण करने वाले आप (सोम) हे अमृतस्वरूप ! परमात्मन् ! (चम्वोः) द्युलोक और पृथिवीलोकों में (आ विशत्) सर्वत्र प्रवेश किये हुए वर्त्त रहे है। दृष्टान्त – (न) जैसे (जनः) प्राणिवर्ग (पुरि) नगर में सर्वत्र प्रविष्ट रहते हैं तद्वत्। वह आप (वनेषु) एकान्त ध्यानयोग्य देशों में (सदः) हृदय कमलरूपी स्थान में (दध्रिषे) धारण किये जाते हैं॥
यद्वा — (अद्रिभिः स्वानः) शिलबट्टों से स्वरस निकाला जाता हुआ और (अव्यया) न घटने वाली (वाराणि) सब की आच्छादक सूर्यकिरणों को (तिरः) अपनी चमक से तिरस्कृत करता हुआ (हरिः) हरितवर्ण धूम वाला (सोम) ओषधिविशेष ! (चम्वोः) हवन से पृथिवी प्रकाश में (आविशत्) सर्वतः प्रवेश करके वर्तमान होता है (जनो न पुरि) जैसे नगरी में प्राणिवर्ग। और (वनेषु) मेघस्थ जलों में (सदः दध्रिषे) स्थान में धारण कराया जाता है।
अर्थात् जब मनुष्य शिलबट्टों से सोम का स्वरस निकाल कर अग्नि में हवन करते हैं, तब हरे रङ्ग के धुएं वाला सोम आकाश और पृथिवी में सूर्यकिरण सा चमकता हुआ मेघस्थ जलों में स्थान पाता है।
Footnote
निघण्टु ३। ३० का प्रमाण और ऋग्वेद ९। १०७। १० का पाठभेद संस्कृतभाष्य में देखिये॥