Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 512

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- सप्तर्षयः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
प꣢री꣣तो꣡ षि꣢ञ्चता सु꣣त꣢꣫ꣳ सोमो꣣ य꣡ उ꣢त्त꣣म꣢ꣳ ह꣣विः꣢ । द꣣धन्वा꣡न् यो नर्यो꣢꣯ अ꣣प्स्वा꣢३꣱न्त꣢꣯रा सु꣣षा꣢व꣣ सो꣢म꣣म꣡द्रि꣢भिः ॥५१२॥

प꣡रि꣢꣯ । इ꣣तः꣢ । सि꣣ञ्चत । सुत꣢म् । सो꣡मः꣢꣯ । यः । उ꣣त्तम꣢म् । ह꣣विः꣢ । द꣣धन्वा꣢न् । यः । न꣡र्यः꣢꣯ । अ꣣प्सु꣢ । अ꣣न्तः꣢ । आ । सु꣣षा꣡व꣢ । सो꣡म꣢꣯म् । अ꣡द्रि꣢꣯भिः । अ । द्रि꣣भिः ॥५१२॥

Mantra without Swara
परीतो षिञ्चता सुतꣳ सोमो य उत्तमꣳ हविः । दधन्वान् यो नर्यो अप्स्वा३न्तरा सुषाव सोममद्रिभिः ॥

परि । इतः । सिञ्चत । सुतम् । सोमः । यः । उत्तमम् । हविः । दधन्वान् । यः । नर्यः । अप्सु । अन्तः । आ । सुषाव । सोमम् । अद्रिभिः । अ । द्रिभिः ॥५१२॥

Samveda - Mantra Number : 512
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(यः) जो (सोमः) सोम (उत्तम हविः) उत्तम हव्य पदार्थ है, उस (सोमम्) सोम को (यः) जो अध्वर्यु आदि पुरुष (अप्सु अन्तः) जलों के मध्य में (अद्रिभिः आसुषाव) पाषाणों से रस खींचता है वह पुरुष (नर्यः) मनुष्यों का हितकारी है और (सुतम्) खींचे हुए उस सोम को (दधन्वान्) धारण करने वाले तुम लोग (इतः) इस संसार में (परिषिञ्चत) हवन से सब ओर छिड़को = फैलाओ॥
यद्वा — (यः) जो (सोमः) परमात्मा रूपी अमृत (उत्तमं हविः) सर्वोत्तम ज्ञानयज्ञ का हवि ग्रहणयोग्य पदार्थ है, उस (सोमम्) परमात्मा रूपी अमृत (अप्सु अन्तः) कर्मों के साक्षिभूत को (यः) जो उपासक (अद्रिभिः) प्राणायामों से (आसुषाव) साक्षात्करता है, वह पुरुष (नर्यः) मनुष्यमात्र का हितकारी है और तुम लोग उम (सुतम्) साक्षात् किये हुए परमात्मा रूपी अमृत को (दधन्वान्) धारण करते हुए (इतः) इस संसार में (परिषिञ्चत) सब ओर छिड़को = आत्मज्ञान का उपदेश करो॥
Footnote
उणादि ४। ६५ निघण्टु २। १ इत्यादि प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋ० ९। १०७। १ में भी॥