Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 511

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- सप्तर्षयः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
पु꣣नानः꣡ सो꣢म꣣ धा꣡र꣢या꣣पो꣡ वसा꣢꣯नो अर्षसि । आ꣡ र꣢त्न꣣धा꣡ योनि꣢꣯मृ꣣त꣡स्य꣢ सीद꣣स्युत्सो꣢ दे꣣वो꣡ हि꣢र꣣ण्य꣡यः꣢ ॥५११॥

पु꣣नानः꣢ । सो꣣म । धा꣡र꣢꣯या । अ꣣पः꣢ । व꣡सा꣢꣯नः । अ꣣र्षसि । आ꣢ । र꣣त्नधाः꣢ । र꣣त्न । धाः꣢ । यो꣡नि꣢꣯म् । ऋ꣣त꣡स्य꣢ । सी꣣दसि । उ꣡त्सः꣢꣯ । उत् । सः꣣ । देवः꣢ । हि꣣रण्य꣡यः꣢ ॥५११॥

Mantra without Swara
पुनानः सोम धारयापो वसानो अर्षसि । आ रत्नधा योनिमृतस्य सीदस्युत्सो देवो हिरण्ययः ॥

पुनानः । सोम । धारया । अपः । वसानः । अर्षसि । आ । रत्नधाः । रत्न । धाः । योनिम् । ऋतस्य । सीदसि । उत्सः । उत् । सः । देवः । हिरण्ययः ॥५११॥

Samveda - Mantra Number : 511
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(सोम) अमृतस्वरूप परमेश्वर ! आप (धारया) अमृत की धारा से (पुनानः) पवित्र करते हुए (अप) कर्मों और जीवात्माओं को (वसानः) व्यापक होकर आच्छादित किए हुए (असि) हमें प्राप्त होते हैं। और (रत्नधाः) रमणीय पदार्थों के धारण करने कराने वाले (हिरण्ययः) ज्योतिःस्वरूप (उत्सः) कूप के समान गम्भीर अमृत के कूप रूप (देवः) आप (ऋतस्य) सत्य वेद के (योनिम्) कारण अपने निज स्वरूप में (आ सीदसि) सब ओर व्याप कर स्थित हैं॥
सोम के पक्ष में: — (सोम) ओषधे ! (धारया पुनानः) अपनी धार से शुद्ध करता हुआ (अपः) जलों में (वसानः) बसा हुआ (अर्षसि) हमें प्राप्त होता है और (रत्नधाः) रम्यपदार्थों का धारण कराने वाला (देवः) दिव्यगुणयुक्त (हिरण्ययः) चमकीला (उत्सः) द्रवरूप (ऋतस्य) यज्ञ के (योनिम्) स्थान में (आ सीदसि) अपने धूम से सब ओर फैल कर स्थित होता है।
Footnote
निघण्टु ३। १० का प्रमाण और ऋ० ९। १०७। ४ का पाठभेद संस्कृतभाष्य में देखिये॥