Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 51

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- सौभरि: काण्व: Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
प्र꣡ दैवो꣢꣯दासो अ꣣ग्नि꣢र्दे꣣व꣢꣫ इन्द्रो꣣ न꣢ म꣣ज्म꣡ना꣢ । अ꣡नु꣢ मा꣣त꣡रं꣢ पृथि꣣वीं꣡ वि वा꣢꣯वृते त꣣स्थौ꣡ नाक꣢꣯स्य꣣ श꣡र्म꣢णि ॥५१॥

प्र꣢ । दै꣡वो꣢꣯दासः । दै꣡वः꣢꣯ । दा꣣सः । अग्निः꣢ । दे꣣वः꣢ । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । न । म꣣ज्म꣡ना꣢ । अ꣡नु꣢꣯ । मा꣣त꣡र꣢म् । पृ꣣थिवी꣢म् । वि । वा꣣वृते । तस्थौ꣢ । ना꣡क꣢꣯स्य । श꣡र्म꣢꣯णि ॥५१॥

Mantra without Swara
प्र दैवोदासो अग्निर्देव इन्द्रो न मज्मना । अनु मातरं पृथिवीं वि वावृते तस्थौ नाकस्य शर्मणि ॥

प्र । दैवोदासः । दैवः । दासः । अग्निः । देवः । इन्द्रः । न । मज्मना । अनु । मातरम् । पृथिवीम् । वि । वावृते । तस्थौ । नाकस्य । शर्मणि ॥५१॥

Samveda - Mantra Number : 51
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(देवोदासः) द्युलोक का दास अनुचर जो विद्युत्, तत्सम्बन्धी (अग्निः) आग (इन्द्रः, न) इन्द्र के समान (मातरम्, पृथिवीम्) माता, पृथिवी के (अनु) चारों ओर (मज्मना) बलपूर्वक (प्र-वि-वावृते) अत्यन्त भाव से फैल रहा है। और (नाकस्य, शर्मणि, तस्थौ) द्युलोक के, घर में स्थित है॥
पृथिवी में एक प्रकार की गरमी है जिसको वेद की भाषा में इस मन्त्र में दैवोदास कहा है क्योंकि वह पृथिवी से निरन्तर बाहर को निकलती रहती हैं। और जिस प्रकार सूर्य की धूप पृथिवी के चारों ओर छा जाती है इसी प्रकार बिजुली के से बल से निकल कर वह भी अपनी माता पृथिवी के चारों ओर दूर-दूर द्युलोक के घर में अर्थात् द्युलोक रूप घर में स्थित है। और वर्षादि का हेतु है। प्रायः पाठक द्युलोक जानने को इच्छा रखते होंगे, इसलिये हमारी समझ में पृथिवी के दूर चारों ओर प्रकाश ही प्रकाश है, वही द्युलोक है और उसमें वर्तमान समस्त दिव्य पदार्थ निरुक्त में लिखे “द्युस्थान देवता” हैं। सूर्य पृथिवी से बहुत बड़ा है पृथिवी उसकी अपेक्षा बहुत ही छोटी है, इस कारण सूर्य से जो प्रकाश की धारा बहती हैं वे पृथिवी के छोरों को छूती हुई सुकड़ती-सुकड़ती चन्द्र से परे जिस बिन्दु स्थान पर मिल जायेंगी वही द्युलोक का आरम्भ है। बस इस दूरी से आगे पृथिवी के चारों ओर अन्धियारा नहीं है और वहाँ के स्थान को द्युलोक जानिए॥
निघण्टु २। ९॥ ३। ४॥ १। ४॥ उणादि ४। ५०॥ २। २८॥ ४। १४५ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये। इस मन्त्र में आये “न” पद की व्याख्या ही सायणाचार्य ने नहीं की और अन्वय पूरा कर दिया ! ज्वालाप्रसाद जी ने “वः” यह पद मूल में न होने पर भी निर्मूल व्याख्यात किया है॥
Footnote
ऋग्वेद ८।१०३।२ में “अग्निर्देवां अच्छा न मज्मना” “नाकस्य सानवि” इतना पाठभेद है॥