Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 509

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अयास्य आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
प्र꣡ न꣢ इन्दो म꣣हे꣡ तु न꣢꣯ ऊ꣣र्मिं꣡ न बिभ्र꣢꣯दर्षसि । अ꣣भि꣢ दे꣣वा꣢ꣳ अ꣣या꣡स्यः꣢ ॥५०९॥

प्र꣢ । नः꣣ । इन्दो । महे꣢ । तु । नः꣣ । ऊर्मि꣢म् । न । बि꣡भ्र꣢꣯त् । अ꣣र्षसि । अभि꣢ । दे꣣वा꣢न् । अ꣣या꣡स्यः꣢ ॥५०९॥

Mantra without Swara
प्र न इन्दो महे तु न ऊर्मिं न बिभ्रदर्षसि । अभि देवाꣳ अयास्यः ॥

प्र । नः । इन्दो । महे । तु । नः । ऊर्मिम् । न । बिभ्रत् । अर्षसि । अभि । देवान् । अयास्यः ॥५०९॥

Samveda - Mantra Number : 509
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(इन्दो) अमृतस्वरूप परमेश्वर ! वा ओषधे ! (देवान्) विद्वान् उपासकों, वा याज्ञिकों को (अभि, अयास्यः) तू सर्वतः प्राप्त होता है और (नः) हमारे (महे) बड़े (तुने) ज्ञान धन, वा धान्यादि धन के लिये (ऊर्मि न) तरंग वा लहर सी (बिभ्रत्) धारण कराता हुआ (प्र, अर्षसि) उच्चभाव से प्राप्त होता है।
जिस प्रकार सोमरस से उत्पन्न हुआ हर्ष मनुष्यों के हृदयों में तरंग सी उठाता है, इसी प्रकार परमात्मा की प्राप्ति से उत्पन्न हुआ आनन्द भी उपासकों के हृदय में लहर सी उठाता है और मग्न कर देता है। इसको वे लोग ही जानते हैं, जिन्हें अनुभव है।
Footnote
निघण्टु २। १० का प्रमाण और ऋग्वेद ९। ४४। १ का पाठभेद संस्कृतभाष्य में देखिये॥