Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 505

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- कश्यपो मारीचः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
इ꣣षे꣡ प꣢वस्व꣣ धा꣡र꣢या मृ꣣ज्य꣡मा꣢नो मनी꣣षि꣡भिः꣢ । इ꣡न्दो꣢ रु꣣चा꣡भि गा इ꣢꣯हि ॥५०५॥

इ꣣षे꣢ । प꣣वस्व । धा꣡र꣢꣯या । मृ꣣ज्य꣡मा꣢नः । म꣣नीषि꣡भिः꣢ । इ꣡न्दो꣢꣯ । रु꣣चा꣢ । अ꣣भि꣢ । गाः । इ꣣हि ॥५०५॥

Mantra without Swara
इषे पवस्व धारया मृज्यमानो मनीषिभिः । इन्दो रुचाभि गा इहि ॥

इषे । पवस्व । धारया । मृज्यमानः । मनीषिभिः । इन्दो । रुचा । अभि । गाः । इहि ॥५०५॥

Samveda - Mantra Number : 505
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(इन्दो) सोम ! वा परमेश्वर ! (मनीषिभिः) यज्ञ के अध्वर्युओं, वा उपासकों से (मृज्यमानः) शोधा जाता हुआ, वा ढूंढा जाता हुआ तू (इषे) गेहूँ आदि अन्न के लिये, वा आत्मा की तृप्तिकारक ध्यानानन्दरस के लिये (धारया पवस्व) धार से प्राप्त हो, वा धारणा से प्राप्त हो और (रुचा) चमक से, वा ज्ञान के प्रकाश से (गाः) स्तुतिकर्तायों को (अभि इहि) सर्वनः प्राप्त हो॥
Footnote
निघण्टु २। ७॥ ३। १५॥ ३। १६ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखि॥
ऋ० ९। ६४। १३ में भी॥