Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 503

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- भृगुर्वारुणिर्जमदग्निर्भार्गवो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
अ꣡र्षा꣢ सोम द्यु꣣म꣡त्त꣢मो꣣ऽभि꣡ द्रोणा꣢꣯नि꣣ रो꣡रु꣢वत् । सी꣢द꣣न्यो꣢नौ꣣ व꣢ने꣣ष्वा꣢ ॥५०३॥

अ꣡र्षा꣢꣯ । सो꣣म । द्युम꣡त्त꣢मः । अ꣣भि꣢ । द्रो꣡णा꣢꣯नि । रो꣡रु꣢वत् । सी꣡द꣢꣯न् । यो꣡नौ꣢꣯ । व꣡ने꣢꣯षु । आ ॥५०३॥

Mantra without Swara
अर्षा सोम द्युमत्तमोऽभि द्रोणानि रोरुवत् । सीदन्योनौ वनेष्वा ॥

अर्षा । सोम । द्युमत्तमः । अभि । द्रोणानि । रोरुवत् । सीदन् । योनौ । वनेषु । आ ॥५०३॥

Samveda - Mantra Number : 503
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(द्युमत्तमः) दीप्तियुक्त, (योनौ, वनेषु, आसीदन्) अपने स्थान, जलों में स्थित (द्रोणानि, अभि, रोदवत्) द्रोण कलशों की ओर, शब्द करता हुआ (सोम) सोमरस (अर्ष) जाता है॥
जब दशापवित्र में से निकलता और द्रोण कलश में धार बन्धकर सोमरस पड़ता है, तो धध धध शब्द करता हुआ सोमसेवियों को आनन्द देता है।
यद्वा (सोम) हे परमेश्वर ! (द्युमत्तमः) अनन्त प्रकाश वाले आप (योनौ वनेषु) गृहरूप हृदयकमलों में (आ सीदन्) विराजमान हुए (द्रोणानि) उपासनारूपी यज्ञ के द्रोणकलश जो हमारे हृदय हैं। (अभि) उनकी ओर (रोरुवत्) वेदशब्दों का उपदेश करते हुए (अर्ष) प्राप्त हूजिये॥
Footnote
निघण्टु ३। ४ में योनि = गृह का नाम है॥