Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 501

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- निध्रुविः काश्यपः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
आ꣡ प꣢वस्व सह꣣स्रि꣡ण꣢ꣳ र꣣यि꣡ꣳ सो꣢म सु꣣वी꣡र्य꣢म् । अ꣣स्मे꣡ श्रवा꣢꣯ꣳसि धारय ॥५०१

आ꣢ । प꣣वस्व । सहस्रि꣡ण꣢म् । र꣣यि꣢म् । सो꣣म । सुवी꣡र्य꣢म् । सु꣣ । वी꣡र्य꣢꣯म् । अ꣣स्मे꣡इति꣢ । श्र꣡वाँ꣢꣯सि । धा꣣रय ॥५०१॥

Mantra without Swara
आ पवस्व सहस्रिणꣳ रयिꣳ सोम सुवीर्यम् । अस्मे श्रवाꣳसि धारय ॥५०१

आ । पवस्व । सहस्रिणम् । रयिम् । सोम । सुवीर्यम् । सु । वीर्यम् । अस्मेइति । श्रवाँसि । धारय ॥५०१॥

Samveda - Mantra Number : 501
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(सोम) ओषधे ! वा परमेश्वर ! (अस्मे) हमारे लिये (सहस्रिणम्) बहुत संख्या वाले (सुवीर्यम्) शोभन वीर्ययुक्त (रयिम) धन का (आपवस्व) लाभ करा और (श्रवांसि) यशों का (धारय) धारण करा। अर्थात् सोमयज्ञ और ईश्वर की कृपा से मनुष्यों को धन वीर्य और यश प्राप्त होते हैं।
Footnote
अष्टाध्यायी के “सुपां०” ७। १। ३९ इस सूत्र से यहाँ चतुर्थी विभक्ति को शे प्रदेश होकर (अस्मे) रूप हुआ और यही रूप सातों विभक्तियों में इसी सूत्र से होता है जैसा कि प्रथमार्थ में, द्वितीयार्थ में, तृतीयार्थ में और इसी मन्त्र में चतुर्थ्यर्थ में, पञ्चम्यर्थ में, ऋ० ३। ३०। १९ में पष्ठ्यर्थ में और सप्तम्यर्थ में ऊपर संस्कृतभाष्य में है॥
ऋ० ९। ६३। १ में भी॥