Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 500

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अवत्सारः काश्यपः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
त꣢र꣣त्स꣢ म꣣न्दी꣡ धा꣢वति꣣ धा꣡रा꣢ सु꣣त꣡स्यान्ध꣢꣯सः । त꣢र꣣त्स꣢ म꣣न्दी꣡ धा꣢वति ॥५००॥

त꣡र꣢꣯त् । सः । म꣣न्दी꣢ । धा꣣वति । धा꣡रा꣢꣯ । सु꣣त꣡स्य꣢ । अ꣡न्ध꣢꣯सः । त꣡र꣢꣯त् । सः । म꣣न्दी꣢ । धा꣣वति ॥५००॥

Mantra without Swara
तरत्स मन्दी धावति धारा सुतस्यान्धसः । तरत्स मन्दी धावति ॥

तरत् । सः । मन्दी । धावति । धारा । सुतस्य । अन्धसः । तरत् । सः । मन्दी । धावति ॥५००॥

Samveda - Mantra Number : 500
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(धारासुतस्य) धार बांध कर निचोड़े हुए सोमरूप (अन्धसः) अन्न के [उपभोग से] (सः) वह इन्द्र अर्थात् विद्युत् वा राजा (मन्दी) हृष्टपुष्ट (तरत्) तीव्रतायुक्त (धावति) गमन वा प्राप्ति करता है (तरत्स मन्दी धावति) यह दूसरी बार दीप्सा अर्थात् अत्यन्त अभिलाषा प्रकट करने को कहा गया है॥
Footnote
ऋ० ९। ५८। १ में भी॥
निरुक्त के परिशिष्ट १३। ६ में इस ऋचा का व्याख्यान इस प्रकार मिलता है कि “वह आनन्दयुक्त जो स्तुति करता है, सब पाप से तरता और उत्तम गति को प्राप्त होता है। धार से निचोड़े, मन्त्र से पवित्र किये, वाणी से स्तुत किये [सोम] का”॥