Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 50

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
श्रु꣣धि꣡ श्रु꣢त्कर्ण꣣ व꣡ह्नि꣢भिर्दे꣣वै꣡र꣢ग्ने स꣣या꣡व꣢भिः । आ꣡ सी꣢दतु ब꣣र्हि꣡षि꣢ मि꣣त्रो꣡ अ꣢र्य꣣मा꣡ प्रा꣢त꣣र्या꣡व꣢भिरध्व꣣रे꣢ ॥५०॥

श्रु꣣धि꣢ । श्रु꣣त्कर्ण । श्रुत् । कर्ण । व꣡ह्नि꣢꣯भिः । दे꣣वैः꣢ । अ꣣ग्ने । सया꣡व꣢भिः । स꣣ । या꣡व꣢꣯भिः । आ । सी꣣दतु । बर्हि꣡षि꣢ । मि꣣त्रः꣢ । मि꣣ । त्रः꣢। अ꣣र्यमा꣢ । प्रा꣣तः । या꣡व꣢꣯भिः । अ꣣ध्वरे꣢ ॥५०॥

Mantra without Swara
श्रुधि श्रुत्कर्ण वह्निभिर्देवैरग्ने सयावभिः । आ सीदतु बर्हिषि मित्रो अर्यमा प्रातर्यावभिरध्वरे ॥

श्रुधि । श्रुत्कर्ण । श्रुत् । कर्ण । वह्निभिः । देवैः । अग्ने । सयावभिः । स । यावभिः । आ । सीदतु । बर्हिषि । मित्रः । मि । त्रः। अर्यमा । प्रातः । यावभिः । अध्वरे ॥५०॥

Samveda - Mantra Number : 50
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(श्रुत्कर्ण) हे सुनने में समर्थ प्रारणी ! तू (श्रुधि) सुन — (अग्निः) परमात्मा और (मित्रः) प्राण वायु तथा (अर्यमा) मारक यम अपान वायु (प्रातर्यावभिः) प्रातः उठकर ध्यानस्थल को जाने वालों से अनुष्ठित (अध्वरे) योगयज्ञ के मध्य (बर्हिषि) उनका यज्ञिय आसन है, उसमें (सयावभिः) सहवर्त्ती (वह्निभिः) देह के बहने वाले (देवैः) उदानादि अन्य वायुओं के साथ (आ-सीदतु) स्थिर होवे॥
तात्पर्य यह है कि मनुष्य को परमात्मा का यह उपदेश सुनना और तदनुकूल आचरण करना चाहिये कि प्रातः काल उठकर ध्यान करने की जगह को जावे और फिर प्राण अपान तथा इनके सहवर्ती उदानादि अन्य वायुओं सहित परमात्मा को उनके ठहने के आसनरूप सुषुम्णादि में ठहरावें॥
भौतिक पक्ष में—(श्रुत्कर्ण) हे सुनने वाले मनुष्य ! तू (श्रुधि) सुन-(अग्निः, मित्रः, अर्यमा) भौतिक अग्नि, मित्र और अर्यमा (प्रातर्यावभिः, अध्वरे) प्रातः उठकर यज्ञ भूमि को जाने वालों से किये हुए, यज्ञ के मध्य (बर्हिषी) कुण्डादि अपने-अपने आसन पर (सयावभिः) सहवर्त्ती (वह्निभिः) हव्य ले जाने वाले (देवः) अन्य देवों के साथ (आ-सीदतु) आहित होवे॥
अर्थात् मनुष्यों को परमात्मा का यह उपदेश सुनना और तदनुकूल आचरण करना चाहिये कि प्रातः काल उठकर यज्ञस्थल पर जावें और फिर अग्नि मित्र अर्यमा आदि देवों का अन्य सहवर्त्ती देवों के साथ स्थापन करें और उन्हें यज्ञभाग दें। अग्नि के अतिरिक्त मित्र अर्यमा अंशुमान् आदि ऐसे कई देवविशेष हैं जो वायु आदि के भेद हैं और जिनको विशेष करके हम लोग [वैदिक प्रणाली के न रहने से] प्रायः भूल गये हैं।
Footnote
अष्टाध्यायी ६। ४। १०२॥ उणादि ४।५१ के प्रपारण संस्कृतभाष्य में देखिये। ऋग्वेद (१।३।३०) में “आ-सीदन्तु....प्रातर्यावाणो अध्वरम्” इतना पाठभेद है॥