Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 5

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- उशना काव्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
प्रे꣡ष्ठं꣢ वो꣣ अ꣡ति꣢थिꣳ स्तु꣣षे꣢ मि꣣त्र꣡मि꣢व प्रि꣣य꣢म् । अ꣢ग्ने꣣ र꣢थं꣣ न꣡ वेद्य꣢꣯म् ॥५॥

प्रे꣡ष्ठ꣢꣯म् । वः꣣ । अ꣡ति꣢꣯थिम् । स्तु꣣षे꣢ । मि꣣त्र꣢म् । मि꣣ । त्र꣢म् । इ꣣व । प्रिय꣢म् । अ꣡ग्ने꣢꣯ । र꣡थ꣢꣯म् । न । वे꣡द्य꣢꣯म् ॥५॥

Mantra without Swara
प्रेष्ठं वो अतिथिꣳ स्तुषे मित्रमिव प्रियम् । अग्ने रथं न वेद्यम् ॥

प्रेष्ठम् । वः । अतिथिम् । स्तुषे । मित्रम् । मि । त्रम् । इव । प्रियम् । अग्ने । रथम् । न । वेद्यम् ॥५॥

Samveda - Mantra Number : 5
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
हे मनुष्यो ! (मित्रमिव प्रियम् ) मित्र के समान हितसाधक (प्रेष्ठम्, अतिथिम् ) अत्यन्त प्रिय, अतिथि (वेद्यम्) वेदी में स्थित (रथं, न) रथ के समान देवतों के वाहन (अग्ने) अग्नि को (वः) तुम्हारे उपकारार्थ (स्तुषे) कीर्त्तन करता कहता अर्थात् उपदेश करता हूं ॥
परमात्मा उपदेश करता है कि अग्नि तुम्हारा मित्र के समान हितसाधक है, तुम को उससे अत्यन्त प्रीति करनी चाहिये, वह अतिथि के समान एक स्थान में स्थित नहीं रहता, उसका स्वभाव सदा चलने का है, तुम उसे वेदी में स्थापन करो, वह रथ के समान वायु आदि का वाहन है अर्थात् अग्नि की सहायता से वायु चलता और अन्य सब भौतिक देव चलते हैं । इसी अग्नि से आन्धी आती तथा वायु का संचार होता है, इत्यादि जानो ॥
उणादिकोष ४ । २ ॥ निरुक्त १ । ४ ॥ ऋग्वेद ८ । ७३ । १ ॥ अष्टाघ्यायी ३ । १ । २४ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखने चाहियें ।
ईश्वर विषय में — हे मनुष्य ! (मित्रमिव, प्रियम्) मित्र के समान, कल्याणकारक (प्रेष्ठम्) अतिप्रिय (अतिथिम् ) निरन्तर व्यापक (वेद्यम् ) जानने योग्य वा हृदयरूप वेदी में ध्यान करने योग्य (रथं, न) रथ के समान सब के आधार और वाहक पहुँचाने वाले (अग्निम् ) प्रकाशमान परमात्मा को (स्तुषे ) तू स्तुति कर ।
Footnote
ऋ० ८ । ७३ । १ में “अग्ने” के स्थान में “अग्नि” यही भेद है, अन्य सब पद तुल्य हैं ॥