Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 495

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अहमीयुराङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
अ꣣या꣢ वी꣣ती꣡ परि꣢꣯ स्रव꣣ य꣡स्त꣢ इन्दो꣣ म꣢दे꣣ष्वा꣢ । अ꣣वा꣡ह꣢न्नव꣣ती꣡र्नव꣢꣯ ॥४९५॥

अ꣣या꣢ । वी꣣ती꣢ । प꣡रि꣢꣯ । स्र꣣व । यः꣢ । ते꣣ । इन्दो । म꣡दे꣢꣯षु । आ । अ꣣वा꣡ह꣢न् । अ꣣व । अ꣡ह꣢꣯न् । न꣣वतीः꣢ । न꣡व꣢꣯ ॥४९५॥

Mantra without Swara
अया वीती परि स्रव यस्त इन्दो मदेष्वा । अवाहन्नवतीर्नव ॥

अया । वीती । परि । स्रव । यः । ते । इन्दो । मदेषु । आ । अवाहन् । अव । अहन् । नवतीः । नव ॥४९५॥

Samveda - Mantra Number : 495
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(इन्दो) सोम ! (अया वीती) उस व्याप्ति से (परिस्रव) अग्नि में टपक कि (यः) जिससे आप्यायित जो सूर्य (ते मदेषु) तेरे उत्पादित हर्षों के होने पर (नव नवतीः) ८१० मेघों को (आ) सब ओर से (अवाऽहन्) हनन करना है॥
अथवा (इन्दो) परमेश्वर ! (अया वीती परिस्रव) उस व्याप्ति से अमृत वर्षा कि (य:) जिससे आप्यायित जीवात्मा (ते मदेषु) आपकी की हुई अमृतदृष्टि से उत्पन्न आनन्दों के होने पर (नव नवतीः) ८१० पापों को (आ) सब ओर से (अवाऽहन्) हननं करता है॥
Footnote
(नव नवतीः) का व्याख्यान विस्तारपूर्वक अध्याय २ दशति ७ ऋचा ५ (१७९) में कर आये हैं वहां देख लीजिए॥
ऋ० ९। ६१। १ में भी।