Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 494

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अहमीयुराङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
स꣡ प꣢वस्व꣣ य꣢꣫ आवि꣣थे꣡न्द्रं꣢ वृ꣣त्रा꣢य꣣ ह꣡न्त꣢वे । व꣣व्रिवा꣡ꣳसं꣢ म꣣ही꣢र꣣पः꣢ ॥४९४॥

सः꣢ । प꣣वस्व । यः꣢ । आ꣡वि꣢꣯थ । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । वृ꣣त्रा꣡य꣢ । ह꣡न्त꣢꣯वे । व꣣व्रिवाँ꣡स꣢म् । म꣣हीः꣢ । अ꣣पः꣢ ॥४९४॥

Mantra without Swara
स पवस्व य आविथेन्द्रं वृत्राय हन्तवे । वव्रिवाꣳसं महीरपः ॥

सः । पवस्व । यः । आविथ । इन्द्रम् । वृत्राय । हन्तवे । वव्रिवाँसम् । महीः । अपः ॥४९४॥

Samveda - Mantra Number : 494
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
सोम ! ओषधे (यः) जो तू (महीः अपः वव्रिवांसम्) भारी जलों को रोके हुए (वृत्राय) मेघ को (हन्तुम्) हनन करने के लिये (इन्द्रम्) विद्युत् वा सूर्य को (आविथ) तृप्त करता है (सः) वह तू (पवस्व) अग्नि में हुए हो॥
ईश्वरपक्ष में—सोम ! परमेश्वर ! (यः) जो आप (मही अपः वव्रिवांसम् वृत्रम्) भारी शुभकर्मों को रोकते हुए पाप को (हन्तुम्) विनष्ट करने के लिये (इन्द्रम् आविथ) जीवात्मा को तृप्त करते हैं (सः पवस्व) वह आप हमें प्राप्त हो।
Footnote
ऋ० ९। ६१। २२ में भी॥