Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 49

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- सुदीतिपुरुमीढावाङ्गिरसौ तयोर्वान्यतरः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
अ꣣ग्नि꣡मी꣢डि꣣ष्वा꣡व꣢से꣣ गा꣡था꣢भिः शी꣣र꣡शो꣢चिषम् । अ꣣ग्नि꣢ꣳ रा꣣ये꣡ पु꣢रुमीढ श्रु꣣तं꣢꣫ नरो꣣ऽग्निः꣡ सु꣢दी꣣त꣡ये꣢ छ꣣र्दिः꣢ ॥४९॥

अ꣣ग्नि꣢म् । ई꣣डिष्व । अ꣡व꣢꣯से । गा꣡था꣢꣯भिः । शी꣣र꣡शो꣢चिषम् । शी꣣र꣢ । शो꣣चिषम् । अग्नि꣢म् । रा꣣ये꣢ । पु꣣रुमीढ । पुरु । मीढ । श्रुत꣢म् । न꣡रः꣢꣯ । अ꣣ग्निः꣢ । सु꣣दीत꣡ये꣢ । सु꣣ । दीत꣡ये꣢ । छ꣣र्दिः꣢ ॥४९॥

Mantra without Swara
अग्निमीडिष्वावसे गाथाभिः शीरशोचिषम् । अग्निꣳ राये पुरुमीढ श्रुतं नरोऽग्निः सुदीतये छर्दिः ॥

अग्निम् । ईडिष्व । अवसे । गाथाभिः । शीरशोचिषम् । शीर । शोचिषम् । अग्निम् । राये । पुरुमीढ । पुरु । मीढ । श्रुतम् । नरः । अग्निः । सुदीतये । सु । दीतये । छर्दिः ॥४९॥

Samveda - Mantra Number : 49
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(पुरुमीढ) हे बहुधा उपदेश से सींचे हुए जीवात्मन् ! तु (शीरशोचिषम्) फैली हुई ज्योति वाले (श्रुतम्) वेदों में विख्यात (अग्निम्) परमात्मा वा भौतिक अग्नि को (अवसे) रक्षा के लिए और (अग्निम्) उसी को (राये) धन के लिए (गाथाभिः) स्तुतिरूपा वाणियों से (ईडिष्व) स्तुत वा वर्णित कर (नरः) हे मष्नुयो ! (अग्निः) पूर्वोक्त दोनों अग्ति (सुदीतये) भले प्रकार रक्षा के लिए (छर्दिः) घर हैं॥
अर्थात् परमात्मा वा भौतकाग्नि का उपदेश पाये हुए मनुष्य को वर्णन करना चाहिए, परमात्मा की कृपा और भौतिकाग्नि के उचित व्यवहार से मनुष्य की रक्षा और रत्नादि धनों की प्राप्ति होती है। इस अग्नि की ज्योति सब ओर फैली है और यह वेदों में बहुधा वर्णित है। जिस प्रकार आंधी और वर्षा आदि उपद्रवों से मनुष्य को उसका घर बचाता है, उसी प्रकार पूर्वोक्त अग्नि मनुष्य को सब प्रकार के रोग, शत्रु आदि के किये उपद्रवों वा काम क्रोधादि दुर्गुणों से बचाता है। परमात्मा के प्यारे लोगों को कामादि जगद्विध्वंसक शत्रु नहीं सता सकते। तथा भौतिकाग्नि से होम वा शिल्प द्वारा काम लेने वाले यजमान आदि शिल्पियों को रोग अकालमर शत्रु निर्धनता आदि की पीड़ा नहीं होती। यदि “श्रुतम्” को व्यत्यय से क्रियापद मानें तो “हे मनुष्यो ! सुनो” यह अन्वय होगा॥
Footnote
उणादि २। ४। २। १३॥ निघण्टु १। ११॥ ३। ४॥ अष्टाध्यायी ३। १। ८५ इत्यादि के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये। ऋग्वेद ८। ७१। १४ में “अग्नि” पाठ है॥५॥