Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 489

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- जमदग्निर्भार्गवः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
आ꣣विश꣢न्क꣣ल꣡श꣢ꣳ सु꣣तो꣢꣫ विश्वा꣣ अ꣡र्ष꣢न्न꣣भि꣡ श्रियः꣢꣯ । इ꣢न्दु꣣रि꣡न्द्रा꣢य धीयते ॥४८९॥

आ꣣विश꣢न् । आ꣣ । विश꣢न् । क꣣ल꣡श꣢म् । सु꣣तः꣢ । वि꣡श्वाः꣢꣯ । अ꣡र्ष꣢꣯न् । अ꣣भि । श्रि꣡यः꣢꣯ । इ꣡न्दुः꣢꣯ । इ꣡न्द्रा꣢꣯य । धी꣣यते ॥४८९॥

Mantra without Swara
आविशन्कलशꣳ सुतो विश्वा अर्षन्नभि श्रियः । इन्दुरिन्द्राय धीयते ॥

आविशन् । आ । विशन् । कलशम् । सुतः । विश्वाः । अर्षन् । अभि । श्रियः । इन्दुः । इन्द्राय । धीयते ॥४८९॥

Samveda - Mantra Number : 489
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(सुतः) सम्पन्न किया हुआ (इन्दुः) सोम (विश्वाः श्रियः) सब सम्पदाओं को (अभि, अर्षन्) सर्वतः फैलाता हुआ (कलशम् आविशन्) द्रोणकलश नामक कलशे में प्रविष्ट होता हुआ (इन्द्राय) यजमान राजा के लिये (धीयते) ‘दशापवित्र’ पर रखखा जाता है।
ईश्वरपक्ष में — (सुतः) शमादिसम्पन्न (इन्दुः) योगेश्वर्य वाला पुरुष (विश्वाः श्रियः अभ्यर्षन्) सब योगसम्पत्तियों को सब ओर फैलाता हुआ (कलशम्) प्रजापति में (आविशन्) अपने को प्रविष्ट जानता हुआ (इन्द्राय) परमेश्वर के लिये (धीयते) उपस्थित होता है॥
Footnote
शतपथ ४। ३। १। ६ में प्रजापति को द्रोणकलश कहा है॥ ऋ० ९। ६२। १९ में जो पाठभेद है वह संस्कृतभाष्य में देखिये॥