Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 483

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- निध्रुविः काश्यपः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
प꣡व꣢स्व दे꣣व꣡ आ꣢यु꣣ष꣡गिन्द्रं꣢꣯ गच्छतु ते꣣ म꣡दः꣢ । वा꣣यु꣡मा रो꣢꣯ह꣣ ध꣡र्म꣢णा ॥४८३॥

प꣡व꣢꣯स्व । दे꣣वः꣢ । आ꣣युष꣢क् । आ꣣यु । स꣢क् । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । गच्छतु । ते । म꣡दः꣢꣯ । वा꣣युम् । आ । रो꣣ह । ध꣡र्म꣢꣯णा ॥४८३॥

Mantra without Swara
पवस्व देव आयुषगिन्द्रं गच्छतु ते मदः । वायुमा रोह धर्मणा ॥

पवस्व । देवः । आयुषक् । आयु । सक् । इन्द्रम् । गच्छतु । ते । मदः । वायुम् । आ । रोह । धर्मणा ॥४८३॥

Samveda - Mantra Number : 483
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
सोम ! (देवः) दिव्यगुणयुक्त तू (आयुषक्) जिससे साथ मिल जावे इस प्रकार (वायुम्) वायु को (धर्मणा) स्वभाव से (आरोह) चढ़ और (ते मदः) तेरा हर्षकारक प्रभाव (इन्द्रम्) सूर्य वा मेघस्थ विद्युत् को (गच्छतु) जावे, इसलिये (पवस्व) प्राप्त हो॥
जो सोम हवन किया जाता है उसका सारांश वा प्रभाव वायु में चढ़कर सूर्य और मेघस्थ विद्युत् को प्राप्त होता है। इससे पूर्वमन्त्रोक्त फल होते हैं, यह तात्पर्य है।
Footnote
ऋ० ९। ६३। २२ में (देवायुषक्) पाठ है॥