Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 482

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- कश्यपो मारीचः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
अ꣡सृ꣢क्षत꣣ प्र꣢ वा꣣जि꣡नो꣢ ग꣣व्या꣡ सोमा꣢꣯सो अश्व꣣या꣢ । शु꣣क्रा꣡सो꣢ वीर꣣या꣡शवः꣢꣯ ॥४८२॥

अ꣡सृ꣢꣯क्षत । प्र । वा꣣जि꣡नः꣢ । ग꣣व्या꣢ । सो꣡मा꣢꣯सः । अ꣣श्वया꣢ । शु꣣क्रा꣡सः꣢ । वी꣣रया꣢ । आ꣣श꣡वः꣢ ॥४८२॥

Mantra without Swara
असृक्षत प्र वाजिनो गव्या सोमासो अश्वया । शुक्रासो वीरयाशवः ॥

असृक्षत । प्र । वाजिनः । गव्या । सोमासः । अश्वया । शुक्रासः । वीरया । आशवः ॥४८२॥

Samveda - Mantra Number : 482
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(गव्या) गौवों की इच्छा से (अश्वया) अश्वों के अभिलाष से (वीरया) और वीर पुरुषों की आकाङ्क्षा से (वाजिनः शुक्रासः आशवः सोमासः) बलिष्ठ वीर्यवर्धक वेग वाले सोम (प्र असृक्षत) [अग्नि में] छोड़े जाते हैं।
अर्थात् जो लोग वेदानुकूल सोमयागादि करते हैं उनकी गौ, अश्व, वीर पुरुष आदि सब पदार्थों के लिये इच्छा को परमात्मा पूर्ण करता है।
Footnote
ऋ० ९। ६४। ४ में भी॥