Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 48

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- मनुर्वैवस्वतः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
अ꣣ग्नि꣢रु꣣क्थे꣢ पु꣣रो꣡हि꣢तो꣣ ग्रा꣡वा꣢णो ब꣣र्हि꣡र꣢ध्व꣣रे꣢ । ऋ꣣चा꣡ या꣢मि मरुतो ब्रह्मणस्पते꣣ दे꣢वा꣣ अ꣢वो꣣ व꣡रे꣢ण्यम् ॥४८॥

अ꣣ग्निः꣢ । उ꣣क्थे꣢ । पु꣣रो꣡हि꣢तः । पु꣣रः꣢ । हि꣣तः । ग्रा꣡वा꣢꣯णः । ब꣣र्हिः꣢ । अ꣣ध्वरे꣢ । ऋ꣣चा꣢ । या꣣मि । मरुतः । ब्रह्मणः । पते । दे꣡वाः꣢꣯ । अ꣡वः꣢꣯ । व꣡रे꣢꣯ण्यम् ॥४८॥

Mantra without Swara
अग्निरुक्थे पुरोहितो ग्रावाणो बर्हिरध्वरे । ऋचा यामि मरुतो ब्रह्मणस्पते देवा अवो वरेण्यम् ॥

अग्निः । उक्थे । पुरोहितः । पुरः । हितः । ग्रावाणः । बर्हिः । अध्वरे । ऋचा । यामि । मरुतः । ब्रह्मणः । पते । देवाः । अवः । वरेण्यम् ॥४८॥

Samveda - Mantra Number : 48
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(उक्थे) वाङ्मय (अध्वरे) यज्ञ में (अग्नि) अग्नि (पुरोहितः) अग्रणी है। (ग्रावाणः) तात्वादिस्थान (बर्हिः) कुशासन हैं। (देवाः) प्राणादि वायु (मरुतः) ऋत्विज् हैं। (ब्रह्मणस्पते) हे वेद के प्रकाशक ! भगवन् ! (ऋचा) मन्त्र से (वरेण्यम्, अवः) उत्तम, रक्षा को (यामि) मांगता हूँ॥
जैसे कर्मयज्ञ में पुरोहित, कुशादि के आसन और होता उद्गाता आदि ऋत्विज् होते हैं, वैसे स्तुतिरूप वाणी के यज्ञ में अग्नि पुरोहित है क्योंकि इसके बिना अग्रणी हुए वाणी की उत्पत्ति नहीं, अग्नि से वाणी इन्द्रिय का बनना ७ वें मन्त्र के भाष्य में लिख ही चुके हैं। जैसे कर्तयज्ञ में ऋत्विजों के बैठने को आसन होते हैं वैसे इस वाग्यज्ञ में ताल्वादिस्थान आसन हैं, जिन पर वायुरूप ऋत्विज् लोग बैठकर अपने-अपने काम करते हैं, अर्थात् प्रयत्न गुरुत्व लघुत्वादि का विभाग करके बोलते हैं। क्योंकि वायु ही तात्वादि स्थानों में आधार पाकर वर्णों का यथावत् उच्चारण करता है। इसलिये हे परमात्मन् ! मैं ऋचा से अपनी रक्षा की प्रार्थना करता हूँ॥
उणादि २७॥ निघण्टु ३। १८॥३।१९॥ राधाकान्त देव वहादुर प्रकाशित “शब्दकल्पद्रुम” के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ताल्वादि स्थानों को “ग्रावा” इसलिए कहा गया है कि यौगिकार्थ इस शब्द का “निगलना और बोलना” है। तथा ग्रावा पत्थर को भी कहते हैं, बस जिस प्रकार ग्रावाओं से यज्ञसामग्री कूट-छेतकर ठीक करते हैं इसी प्रकार वाग्यज्ञ की सामग्री दन्त, तालु, मूर्द्धा आदि से ठीक की जाती है॥
सायणाचार्य ने इस मन्त्र के भाष्य में ३ भूल की हैं। १—“यामि” की सिद्धि में वर्णलोपादि वृथा परिश्रम करना और निघं० ३। १६ में यामि का याचना अर्थ न देखना॥ २—“याचामि” यह परस्मैपद का स्वयं प्रयोग करना॥ ३—मूलमन्त्र में “वः” यह पद ही नहीं है फिर निर्मूल “वः, युष्माकम्” यह भाष्य करना॥ यह ही तीनों भूलें गतानुगतिकता से ज्वालाप्रसाद भार्गव (आगरा) ने भी की हैं॥
Footnote
ऋग्वेद (८।२७।१) में “ब्रह्मणस्पति देवान्” यह द्वितीयान्त पाठभेद है॥४॥