Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 479

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अहमीयुराङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
प꣡व꣢स्वेन्दो꣣ वृ꣡षा꣢ सु꣣तः꣢ कृ꣣धी꣡ नो꣢ य꣣श꣢सो꣣ ज꣡ने꣢ । वि꣢श्वा꣣ अ꣢प꣣ द्वि꣡षो꣢ जहि ॥४७९॥

प꣡व꣢꣯स्व । इ꣣न्दो । वृ꣡षा꣢꣯ । सु꣣तः꣢ । कृ꣣धी꣢ । नः꣣ । यश꣡सः꣢ । ज꣡ने꣢꣯ । वि꣡श्वाः꣢꣯ । अ꣡प꣢꣯ । द्वि꣡षः꣢꣯ । ज꣣हि ॥४७९॥

Mantra without Swara
पवस्वेन्दो वृषा सुतः कृधी नो यशसो जने । विश्वा अप द्विषो जहि ॥

पवस्व । इन्दो । वृषा । सुतः । कृधी । नः । यशसः । जने । विश्वाः । अप । द्विषः । जहि ॥४७९॥

Samveda - Mantra Number : 479
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(इन्दो) हे सोम ! वा परमेश्वर ! (वृषा) वीर्यवर्धक, वा कामना पूर्ण करने वाला (सुतः) खींचा हुआ, वा हृदय कमल में साक्षात् किया हुआ तू (पवस्व) प्राप्त हो और (जने) मनुष्यवर्ग में (नः) हमको (यशसः) यशस्वी (कृधि) कर तथा (विश्वा) सव (द्विषः) शत्रुओं, वा काम क्रोधादिकों को (अप जहि) नष्ट कर।
भौतिकपक्ष में भाव यह है कि—सोम का सेवन करने वाले मनुष्यों में यश वाले, पराक्रमी और शत्रुओं का नाश करने वाले होने सम्भव हैं।
Footnote
ऋग्वेद ९। ६१। २८ में भी॥