Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 473

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- जमदग्निर्भार्गवः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
अ꣡सा꣢व्य꣣ꣳशु꣡र्मदा꣢꣯या꣣प्सु꣡ दक्षो꣢꣯ गिरि꣣ष्ठाः꣢ । श्ये꣣नो꣢꣫ न योनि꣣मा꣡स꣢दत् ॥४७३॥

अ꣡सा꣢꣯वि । अँ꣣शुः꣢ । म꣡दा꣢꣯य । अ꣣प्सु꣢ । द꣡क्षः꣢꣯ । गि꣣रिष्ठाः꣢ । गि꣣रि । स्थाः꣢ । श्ये꣣नः꣢ । न । यो꣡नि꣢꣯म् । अ । अ꣣सदत् ॥४७३॥

Mantra without Swara
असाव्यꣳशुर्मदायाप्सु दक्षो गिरिष्ठाः । श्येनो न योनिमासदत् ॥

असावि । अँशुः । मदाय । अप्सु । दक्षः । गिरिष्ठाः । गिरि । स्थाः । श्येनः । न । योनिम् । अ । असदत् ॥४७३॥

Samveda - Mantra Number : 473
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(मदाय) हर्ष = वृद्धि के लिये (अंशुः) सोम (असावि) खींचा जाता है (गिरिष्ठाः) पर्वत पर उत्पन्न होता, वा मेघमण्डल में स्थित हुआ (अप्सु) अन्तरिक्षजल में (दक्षः) बलिष्ठ होता और बढ़ता है। यह सोम (श्येनो न) बिजुली के समान (योनिम्) अपने कारण को (आसदत्) प्राप्त हो जाता है॥
सोम शीतप्रधान देशों वा पर्वतों में उत्पन्न होता है, विद्युत् के बल विशिष्ट होने से विद्युत् उसका कारण कहा जाता है। वह हवन किया हुआ अपने कारण विद्युत् और मेघ द्वारा पुनः पर्वतादि जन्मभूमियों को पहुँच जाता है॥
Footnote
निघण्टु १। १४ का प्रमाण संस्कृतभाष्य के देखिये॥
ऋ० ९। ६२। ४ में भी॥