Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 471

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- त्रित आप्त्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
ति꣣स्रो꣢꣫ वाच꣣ उ꣡दी꣢रते꣣ गा꣡वो꣢ मिमन्ति धे꣣न꣡वः꣢ । ह꣡रि꣢रेति꣣ क꣡नि꣢क्रदत् ॥४७१॥

ति꣣स्रः꣢ । वा꣡चः꣢꣯ । उत् । ई꣣रते । गा꣡वः꣢꣯ । मि꣣मन्ति । धेन꣡वः꣢ । ह꣡रिः꣢꣯ । ए꣣ति । क꣡नि꣢꣯क्रदत् ॥४७१॥

Mantra without Swara
तिस्रो वाच उदीरते गावो मिमन्ति धेनवः । हरिरेति कनिक्रदत् ॥

तिस्रः । वाचः । उत् । ईरते । गावः । मिमन्ति । धेनवः । हरिः । एति । कनिक्रदत् ॥४७१॥

Samveda - Mantra Number : 471
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
सोम के यज्ञ का वर्णन करता है— (तिस्रः) ऋग्, यजुः और साम तीन लक्षणयुक्त (वाचः) वाणियों को (उदीरते) ऋत्विज् लोग उच्चारते हैं और (धेनवः गावः) दुधार गौवें (मिमन्ति) [दुहने को] पुकारती हैं तथा (हरिः) सोम (कनिक्रदत्) अग्नि से गिरते हुए निरन्तर जलमय होने से चिटचिटा शब्द करता हुआ (एति) जाता है॥
अर्थात् सोमरस की धार चिटचिटाती अग्नि में पड़ती है, ऋत्विज् लोग तीनों प्रकार की ऋचाओं का पाठ करते हैं और प्रातः गोदोहनकाल होता है, यह भी सूचित किया है।
Footnote
अष्टाध्यायी ७। ४। ६५ धातुपाठादि के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥
ऋ० ९। ३३। ४ में भी॥५॥