Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 470

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अहमीयुराङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
य꣢स्ते꣣ म꣢दो꣣ व꣡रे꣢ण्य꣣स्ते꣡ना꣢ पव꣣स्वा꣡न्ध꣢सा । दे꣣वावी꣡र꣢घशꣳस꣣हा꣢ ॥४७०॥

यः꣢ । ते꣣ । म꣡दः꣢꣯ । व꣡रे꣢꣯ण्यः । ते꣡न꣢꣯ । प꣣वस्व । अ꣡न्ध꣢꣯सा । दे꣣वावीः꣢ । दे꣣व । अवीः꣢ । अ꣣घशँसहा꣢ । अ꣢घशँस । हा꣢ ॥४७०॥

Mantra without Swara
यस्ते मदो वरेण्यस्तेना पवस्वान्धसा । देवावीरघशꣳसहा ॥

यः । ते । मदः । वरेण्यः । तेन । पवस्व । अन्धसा । देवावीः । देव । अवीः । अघशँसहा । अघशँस । हा ॥४७०॥

Samveda - Mantra Number : 470
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
हे सोम ! (यः) जो (ते) तेरा (वरेण्यः) स्वीकार करने योग्य (देवावीः) देवों का रक्षक और (अघशंसहा) असुरों का नाशक (मदः) हर्षकर प्रभाव है (तेन) उस (अन्धसा) आदरयोग्य अन्न से (पवस्व) प्राप्त हो॥
सोमरस में ऐसा मद—हर्ष है कि जिस से सज्जनों की रक्षा और दुर्जन का तिरस्कार होता है, इससे वह सब को स्वीकार करना चाहिए॥
Footnote
ऋ० ९। ६१। १९ में भी॥