Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 47

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- सौभरि: काण्व: Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
अ꣡द꣢र्शि गातु꣣वि꣡त्त꣢मो꣣ य꣡स्मि꣢न्व्र꣣ता꣡न्या꣢द꣣धुः꣢ । उ꣢पो꣣ षु꣢ जा꣣त꣡मार्य꣢꣯स्य व꣡र्ध꣢नम꣣ग्निं꣡ न꣢क्षन्तु नो꣣ गि꣡रः꣢ ॥४७॥

अ꣡द꣢꣯र्शि । गा꣣तुवि꣡त्त꣢मः । गा꣣तु । वि꣡त्त꣢꣯मः । य꣡स्मि꣢꣯न् । व्र꣣ता꣡नि꣢ । आ꣣दधुः꣢ । आ꣣ । दधुः꣢ । उ꣡प꣢꣯ । उ꣣ । सु꣢ । जा꣣त꣢म् । आ꣡र्य꣢꣯स्य । व꣡र्ध꣢꣯नम् । अ꣣ग्नि꣢म् । न꣣क्षन्तु । नः । गि꣡रः꣢꣯ ॥४७॥

Mantra without Swara
अदर्शि गातुवित्तमो यस्मिन्व्रतान्यादधुः । उपो षु जातमार्यस्य वर्धनमग्निं नक्षन्तु नो गिरः ॥

अदर्शि । गातुवित्तमः । गातु । वित्तमः । यस्मिन् । व्रतानि । आदधुः । आ । दधुः । उप । उ । सु । जातम् । आर्यस्य । वर्धनम् । अग्निम् । नक्षन्तु । नः । गिरः ॥४७॥

Samveda - Mantra Number : 47
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(गातुवित्तमः) योगभूमि को उत्तम प्रकार से जानने वाले लोग (यस्मिन्) जिस परमात्मा में (व्रतानि) कर्मों को (आ दधुः) अर्पण करते हैं वह (अदर्शि) साक्षात् हो जाता है, उस (सु-जातम्) साक्षात् हुए (आर्यस्य) उपासक की (वर्धनम्) उन्नति करने वाले (अग्निम्) परमात्मा को (नः) हमारी (गिरः) स्तुतियाँ (उप उ नक्षन्तु) उपस्थित हों॥
अर्थात् जो योगभुमियों के उत्तम ज्ञाता योगी लोग उस परमात्मा को ही समस्त शुभ कर्मों का अर्पण कर देते हैं, और निष्काम भजन करते हैं, वह दयालु उनके हृदयकमलों में प्रकट होता है अर्थात् साक्षात् अनुभव में आता है। तथा उन आर्यों की वृद्धि–उन्नति करता है। इसलिए उस साक्षात् हुए जगत्पिता को हमारी स्तुतियां प्राप्त हों॥
भौतिक पक्ष में — (गातुवित्तमः) यज्ञ वा शिल्पभूमि के ज्ञाता (यस्मिन्) जिस अग्नि में (व्रतानि) कर्मों और शिल्पों को (आ-दधु) आहित करते हैं, वह (अदर्शि) प्रदीप्त होता है और उस (सु जातम्) भले प्रकार प्रदीप्त हुए (आर्यस्य) आर्य याज्ञिक और शिल्पी की (वर्धनम्) उन्नति करने वाले (अग्निम्) अग्नि को (नः) हमारी (गिरः) वर्णन रूप वाणियां (उप उ नक्षन्तु) उपस्थित हों॥
अर्थात् अग्नि से काम लेना चाहने वाले को प्रथम अग्निस्थापना की भूमि का ज्ञान अच्छे प्रकार प्राप्त करना चाहिए, तब अग्नि को प्रकट करना चाहिए, फिर जो कर्म करना हो, अग्नि पर प्रारम्भ करना चाहिये। ऐसा करने से वह अग्नि उस आर्य यज्ञकर्त्ता वा शिल्पी की वृद्धि—उन्नति करता है। इसलिए हमारी वाणी जो अग्नि के गुण वर्णन करने वाली है वे उसमें उपस्थित रहें, जिससे हम स्वयं अग्नि के गुणों को जानकर उपयोग लेते हुए इष्ट सुखों को प्राप्त हों और अन्यों को करावें॥
Footnote
निघं०१।१॥ २। १ के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋग्वेद ८।१०३।१ में “नक्षन्त” इतना पाठभेद है॥