Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 467

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अहमीयुराङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
उ꣣च्चा꣡ ते꣢ जा꣣त꣡मन्ध꣢꣯सो दि꣣वि꣡ सद्भूम्या द꣢꣯दे । उ꣣ग्र꣢꣫ शर्म꣣ म꣢हि꣣ श्र꣡वः꣢ ॥४६७॥

उ꣣च्चा꣢ । उ꣣त् । चा꣢ । ते꣣ । जात꣢म् । अ꣡न्ध꣢꣯सः । दि꣣वि꣢ । सत् । भू꣡मि꣢꣯ । आ । द꣣दे । उग्र꣢म् । श꣡र्म꣢ । म꣡हि꣢꣯ । श्र꣡वः꣢꣯ ॥४६७॥

Mantra without Swara
उच्चा ते जातमन्धसो दिवि सद्भूम्या ददे । उग्र शर्म महि श्रवः ॥

उच्चा । उत् । चा । ते । जातम् । अन्धसः । दिवि । सत् । भूमि । आ । ददे । उग्रम् । शर्म । महि । श्रवः ॥४६७॥

Samveda - Mantra Number : 467
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
अगले मन्त्र में स्पष्ट सोम पद के ग्रहण को देख कर प्रकरण से हे सोम ! (ते) तेरे (अन्धसः) अन्न–भोजन से (जातम्) उत्पन्न (उग्रम्) प्रभावशाली (शर्म) सुख को और (महि) बड़े (श्रवः) यश को (दिवि) स्वर्ग=सुखस्थान में (सत्) विद्यमान को (भूमिः) भूमिस्थ पुरुष (आददे) ग्रहण करता है॥
भाव यह है कि — पृथिवी के वे मनुष्य जो सोमरस का भोग लगाते हैं, वे उस से उत्पन्न हुए बड़े सुख और यश को प्राप्त होते हैं। सोमरस दुग्ध के समान श्वेत रंग वाली लताओं से निकलता है।
Footnote
यह बात ऋग्वेद ९। १०७। ९ में (सोमो दुग्धा०) लिखी है। ऋ० ९। ६१। १० में भी॥