Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 461

1875 Mantra
Devata- विश्वेदेवाः Rishi- परुच्छेपो दैवोदासिः Chhand- अत्यष्टिः Swara- गान्धारः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
अ꣢स्तु꣣ श्रौ꣡ष꣢ट्पु꣣रो꣢ अ꣣ग्निं꣢ धि꣣या꣡ द꣢ध꣣ आ꣡ नु त्यच्छर्धो꣢꣯ दि꣣व्यं꣡ वृ꣢णीमह इन्द्रवा꣣यू꣡ वृ꣢णीमहे । य꣡द्ध꣢ क्रा꣣णा꣢ वि꣣व꣢स्व꣢ते꣣ ना꣡भा꣢ स꣣न्दा꣢य꣣ न꣡व्य꣢से । अ꣢ध꣣ प्र꣢ नू꣣न꣡मुप꣢꣯ यन्ति धी꣣त꣡यो꣢ दे꣣वा꣢꣫ꣳअच्छा꣣ न꣢ धी꣣त꣡यः꣢ ॥४६१॥

अ꣡स्तु꣢꣯ । श्रौ꣡ष꣢꣯ट् । पु꣣रः꣢ । अ꣣ग्नि꣢म् । धि꣣या꣢ । द꣣धे । आ꣢ । नु । त्यत् । श꣡र्धः꣢꣯ । दि꣣व्य꣢म् । वृ꣣णीमहे । इन्द्रवायू꣢ । इ꣣न्द्र । वायू꣡इति꣢ । वृ꣣णीमहे । य꣢त् । ह꣣ । क्राणा꣢ । वि꣣व꣡स्व꣢ते । वि꣣ । व꣡स्व꣢꣯ते । ना꣡भा꣢꣯ । स꣣न्दा꣡य꣢ । स꣣म् । दा꣡य꣢꣯ । न꣡व्य꣢꣯से । अ꣡ध꣢꣯ । प्र । नू꣣न꣢म् । उ꣡प꣢꣯ । य꣣न्ति । धीत꣡यः꣢ । दे꣡वा꣢न् । अ꣡च्छ꣢꣯ । न । धी꣣त꣡यः꣢ ॥४६१॥

Mantra without Swara
अस्तु श्रौषट्पुरो अग्निं धिया दध आ नु त्यच्छर्धो दिव्यं वृणीमह इन्द्रवायू वृणीमहे । यद्ध क्राणा विवस्वते नाभा सन्दाय नव्यसे । अध प्र नूनमुप यन्ति धीतयो देवाꣳअच्छा न धीतयः ॥

अस्तु । श्रौषट् । पुरः । अग्निम् । धिया । दधे । आ । नु । त्यत् । शर्धः । दिव्यम् । वृणीमहे । इन्द्रवायू । इन्द्र । वायूइति । वृणीमहे । यत् । ह । क्राणा । विवस्वते । वि । वस्वते । नाभा । सन्दाय । सम् । दाय । नव्यसे । अध । प्र । नूनम् । उप । यन्ति । धीतयः । देवान् । अच्छ । न । धीतयः ॥४६१॥

Samveda - Mantra Number : 461
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 12;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
हे इन्द्र ! परमेश्वर ! (धिया) प्रणयनादि कर्म से, वा बुद्धि से (पुरः) सामने की व्यवधान रहित उत्तर वेदी में वा साक्षात् (अग्निम्) आहवनीय नाम अग्नि, वा परमेश्वर को (आदधे) मैं आधान करता, वा धारण करता हूं। (त्यत्) उस अग्न्याधान सम्बन्धी (दिव्यम्) उत्तम (शर्धः) बल को (वृणीमहे) हम वरते हैं [अपने अभिप्राय से बहुवचन है] (नु) शीघ्र (नाभा) वेदी की नाभि वा अपने नाभिचक्र में (नव्यसे विवस्वते) नये उदय हुए सूर्य, वा प्राण के लिए (संदाय) हव्य देकर, वा शुद्धि करके (यत्) जव (ह) प्रसिद्ध (क्राणा) काम करने वाले (इन्द्रवायू) बिजुली और वायु, वा मन और प्राण को (वृणीमहे) वरण करते हैं, तब (अध) इसके पश्चात् (धीतयः धीतयः) हमारी सब अंगुलियें, वा हमारे सब कर्म (देवान्) वायु आदि, वा प्राणादि देवतों को (अच्छ न) अभिव्याप्त होने के समान (नूनम्) अवश्य (उप प्र यन्ति) प्राप्त होते हैं। सो यह (श्रौषट्) श्रवण (अस्तु) हो।
Footnote
ऋत्विज लोगों की शाला से पश्चिम की ओर ‘प्राचीनवंश’ नामक यज्ञवेदी की दक्षिण दिशा में धनुषाकार एक कुण्ड होता है, उसमें का अग्नि “दक्षिणाग्नि” कहाता है। उत्तर में कुण्ड नहीं होता। पश्चिम में गोलाकार कुण्ड होता है, उसमें का अग्नि “गार्हपत्य” कहाता है। पूर्वदिशा में चौखूटा कुण्ड होता है, उसमें का अग्नि “आहवनीय” कहाता है। और पूर्वदिशा में ही पूर्वोक्त कुण्ड से आगे एक अन्य कुण्ड भी होता है उसे “उत्तरवेदी” वा “परली वेदी” कहते हैं। उसके मध्य की भूमि “नाभि” कहाती है। उसमें अध्वर्यु और प्रतिहार के कर्म होते हैं। किन्तु होता का होम सम्बन्ध वा अग्निसम्बन्ध उससे कुछ नहीं होता इस प्रकार “पुरः” शब्द से पूर्व दिशा की पहली अव्यवहित चौखूंटी वेदी का ग्रहण है।
निघण्टु २।१॥ २। ९॥ २। ५ निरुक्त ३। ८ शतपथ १२। ९। १। १३ के प्रमाण और ऋ० १। १३९। १। ५ पाठभेद संस्कृतभाष्य में देखिये॥