Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 46

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- भर्गः प्रागाथः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
शे꣢षे꣣ वने꣡षु꣢ मा꣣तृ꣢षु꣣ सं꣢ त्वा꣣ म꣡र्ता꣢स इन्धते । अ꣡त꣢न्द्रो ह꣣व्यं꣡ व꣢हसि हवि꣣ष्कृ꣢त꣣ आ꣢꣫दिद्दे꣣वे꣡षु꣢ राजसि ॥४६॥

शे꣡षे꣢꣯ । व꣡ने꣢꣯षु । मा꣣तृ꣡षु꣢ । सम् । त्वा꣣ । म꣡र्ता꣢꣯सः । इ꣣न्धते । अ꣡त꣢꣯न्द्रः । अ । त꣣न्द्रः । ह꣣व्यम् । व꣣हसि । हविष्कृ꣡तः꣢ । ह꣣विः । कृ꣡तः꣢꣯ । आत् । इत् । दे꣣वे꣡षु꣢ । रा꣣जसि ॥४६॥

Mantra without Swara
शेषे वनेषु मातृषु सं त्वा मर्तास इन्धते । अतन्द्रो हव्यं वहसि हविष्कृत आदिद्देवेषु राजसि ॥

शेषे । वनेषु । मातृषु । सम् । त्वा । मर्तासः । इन्धते । अतन्द्रः । अ । तन्द्रः । हव्यम् । वहसि । हविष्कृतः । हविः । कृतः । आत् । इत् । देवेषु । राजसि ॥४६॥

Samveda - Mantra Number : 46
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
आग्नेयकाण्ड के प्रकरण से हे अग्ने परमात्मन् ! आप (वनेषु) वनस्थानी देहों में (मातृषु) आपके साक्षात्काररूप प्रकट होने के स्थान हृदयों में (शेषे) शयन करते हों। (त्वा) आपका (मर्त्तासः) मनुष्य (सम् इन्धते) ध्यान करते हैं। (अतन्द्रः) आलस्यरहित जागरूक आप (हविष्कृतः) कर्मकर्त्ता के (हव्यम्) कर्मफल को (वहसि) पहुँचाते हैं। (आत् इत्) इसके अतिरिक्त (देवेषु) पृथिव्यादि सब पदार्थों में (राजसि) प्रकाश करते हैं॥
जिस प्रकार वन के काष्ठों में अदृश्य रूप से अग्नि वर्तमान है और वे वन उस अग्नि को माता के समान गर्भ में ले रहे हैं और मनुष्य लोग उस छिपे अग्नि को मन्थन द्वारा प्रकट करके प्रदीप्त कर लेते हैं। इसी प्रकार परमात्मारूप महान् अग्नि, देहरूप भस्मान्तभावी वनों में व्याप रहा है, उसे योगी लोग अपने हृदयों की भूमियों में प्रकाशित पाते हैं। वे हृदयभूमियाँ परमात्मा को प्रकट [साक्षात्] करने के स्थान हैं। ध्यानरूप मन्थन से वह प्रकट होता है। शयन कहने से निद्रा की भ्रांति न हो इसलिये “अतन्द्रः” कहा गया है अर्थात् वह दयालु आलस्यरहित सबको कर्मों का फल पहुँचाता है तथा सम्पूर्ण देहों, इन्द्रियों तथा पृथिव्यादि भूतों में प्रकाश कर रहा है।
भौतिक पक्ष में अग्ने ! तू (मातृषु वनेषु, शेषे) गर्भ रूप से तुझे छिपा हुआ धारने वाले, वनों में, शयन करता है (मर्त्तासः, त्वा, सम्-इन्धते) मनुष्य लोग, तुझे, प्रदीप्त करते हैं (अतन्द्रः) प्रदीप्त हुआ तू (हविष्कृतः, हव्यं, वहसि) यज्ञकर्त्ता के हव्य को, पहुँचाता और (आत्-इत्) अनन्तर ही (देवेषु) वाय्वादि देवों में (राजसि) जा विराजता है॥
अर्थात् वन के काष्ठ अग्नि की उत्पत्तिभूमि माता हैं, उनके गर्भ में छिपा हुआ अग्नि है. जिसे मनुष्य लोग यज्ञादि कार्यों में मथ कर प्रदीप्त कर लेते हैं और वह प्रदीप्त होकर हवन किये हुए द्रव्यों को वाय्वादि देवों में पहुँचाता है॥
Footnote
अष्टाध्यायी (वा० १। ४। ८७) का प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये। ऋग्वेद ८। ७। ६० में “मात्रोः, हव्या” इतना पाठभेद है॥