Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 45

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
ए꣣ना꣡ वो꣢ अ꣣ग्निं꣡ नम꣢꣯सो꣣र्जो꣡ नपा꣢꣯त꣣मा꣡ हु꣢वे । प्रि꣣यं꣡ चेति꣢꣯ष्ठमर꣣ति꣡ꣳ स्व꣢ध्व꣣रं꣡ विश्व꣢꣯स्य दू꣣त꣢म꣣मृ꣡त꣢म् ॥४५॥

ए꣣ना꣢ । वः꣣ । अग्नि꣢म् । न꣡म꣢꣯सा । ऊ꣣र्जः꣢ । न꣡पा꣢꣯तम् । आ । हु꣣वे । प्रिय꣢म् । चे꣡ति꣢꣯ष्ठम् । अर꣣ति꣢म् । स्व꣣ध्वरम् । सु । अध्वर꣢म् । वि꣡श्व꣢꣯स्य दू꣣त꣢म् । अ꣣मृ꣡त꣢म् । अ꣣ । मृ꣡त꣢꣯म् ॥४५॥

Mantra without Swara
एना वो अग्निं नमसोर्जो नपातमा हुवे । प्रियं चेतिष्ठमरतिꣳ स्वध्वरं विश्वस्य दूतममृतम् ॥

एना । वः । अग्निम् । नमसा । ऊर्जः । नपातम् । आ । हुवे । प्रियम् । चेतिष्ठम् । अरतिम् । स्वध्वरम् । सु । अध्वरम् । विश्वस्य दूतम् । अमृतम् । अ । मृतम् ॥४५॥

Samveda - Mantra Number : 45
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
परमात्मा उपदेश करता है कि हे उपासको ! मैं (वः) तुम्हारे लिये (एना, नमसा) इस स्तोत्र से (ऊर्जः, नपातम्) बल के रक्षक (प्रियम्) हितकर (चेतिष्ठम्) ज्ञानदाता (अरतिम्) स्वामी (स्वध्वरम्) सुष्ठु पूजनीय (विश्वस्य, दूतम्) सबके, कर्मफल पहुँचाने वाले (अमृतम्) अमर (अग्निम्) अपने स्वरूप का (आ-हुवे) उपदेश करता हूं, जताता हूं।
इस मन्त्र तथा पूर्व मन्त्रों में वरिंगत स्तोत्र के अनुसार परमात्मा अपने स्वरूप का बोध कराता है।
भौतिक पक्ष में:— हे याज्ञिको ! मैं (वः) तुम्हारे लिये (ऊर्जः, नपातम्) अन्न और बल के रक्षक (प्रियम्) हितसाधक (चेतिष्ठम्) अत्यन्त चेताने वाले (अरतिम्) गमनशील (स्वध्वरम्) यज्ञ के सुधारने वाले (विश्वस्य) संसारभर के (दूतम्) दूत के समान इत उत पदार्थों के पहुँचाने वाले (अमृतम्) अमर (अग्निम्) अग्नि का (एना, नमसा) उक्त, गुणवर्णन से (आ-हुवे) उपदेश करता हूं॥
मन्त्रोक्त गुणों के साथ अग्नि के जानने का परमात्मा उपदेश करता है। गुणों का वर्णन [बयान] स्तोत्र कहता है। प्रकाश अग्नि का गुण है और प्रकाश से चेत होता है, इसलिये अग्नि को “चेताने वाला” कहा है। जिस प्रकार अमर जीवात्मा एक देह से दूसरे देह को धारण करता है, मरता नहीं, इसी प्रकार अग्नि एक काष्ठादि से निकल कर अन्य पदार्थों में प्रवेश करता है, मरता नहीं। इसलिये नित्य अग्नितत्त्व को “अमर” कहा गया है। जब तक देहादि में अग्नि रहता है तब तक देहादि का पात [नाश] नहीं होता, इसलिये इसको “बल का रक्षक’ कहा है। कर्मकाण्ड का उपयोगी होने से “यज्ञ का सुधारने वाला” कहा है॥
Footnote
अष्टाध्यायी ७। १। ३९॥ निघण्टु २। ७॥ ३। ९ के प्रमाण संस्कृत-भाष्य में देखिये॥ ऋग्वेद ७। १६। १ में भी ऐसा पाठ है॥