Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 445

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- त्रसदस्युः Chhand- द्विपदा विराट् पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
अ꣡र्च꣢न्त्य꣣र्कं꣢ म꣣रु꣡तः꣢ स्व꣣र्का꣡ आ स्तो꣢꣯भति श्रु꣣तो꣢꣫ युवा꣣ स꣡ इन्द्रः꣢꣯ ॥४४५॥

अ꣡र्च꣢꣯न्ति । अ꣣र्कं꣢ । म꣣रु꣡तः꣢ । स्व꣣र्काः꣢ । सु꣣ । अर्काः꣢ । आ । स्तो꣣भति । श्रुतः꣢ । यु꣡वा꣢꣯ । सः । इ꣡न्द्रः꣢꣯ ॥४४५॥

Mantra without Swara
अर्चन्त्यर्कं मरुतः स्वर्का आ स्तोभति श्रुतो युवा स इन्द्रः ॥

अर्चन्ति । अर्कं । मरुतः । स्वर्काः । सु । अर्काः । आ । स्तोभति । श्रुतः । युवा । सः । इन्द्रः ॥४४५॥

Samveda - Mantra Number : 445
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 10;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(स्वर्काः) शोभन मन्त्रों वाले (मरुतः) स्तोत्रयज्ञ के ऋत्विक् लोग (अर्कम्) पूजनीय ईश्वर को (अर्चन्ति) पूजते हैं और (सः) वह (युवा) महाबली (श्रुतः) वेदों में विख्यात (इन्द्रः) परमेश्वर (आस्तोभति) स्तुत किया जाता है॥
Footnote
निरुक्त ५। ४ और इन्द्र शब्द से परमेश्वरार्थ ग्रहण में मीमांसाभाष्यस्थ शबर स्वामी की सम्मति जो सत्यव्रत सामश्रमी जी ने टिप्पणी में दी है वह संस्कृतभाष्य में देखिये॥