Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 444

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- त्रसदस्युः Chhand- द्विपदा विराट् पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
उ꣡प꣢ प्र꣣क्षे꣡ मधु꣢꣯मति क्षि꣣य꣢न्तः꣣ पु꣡ष्ये꣢म र꣣यिं꣢ धी꣣म꣡हे꣢ त इन्द्र ॥४४४॥

उ꣡प꣢꣯ । प्र꣣क्षे꣢ । प्र꣣ । क्षे꣢ । म꣡धु꣢꣯मति । क्षि꣣य꣡न्तः꣢ । पु꣡ष्ये꣢꣯म । र꣣यि꣢म् । धी꣣म꣡हे꣢ । ते꣣ । इन्द्र ॥४४४॥

Mantra without Swara
उप प्रक्षे मधुमति क्षियन्तः पुष्येम रयिं धीमहे त इन्द्र ॥

उप । प्रक्षे । प्र । क्षे । मधुमति । क्षियन्तः । पुष्येम । रयिम् । धीमहे । ते । इन्द्र ॥४४४॥

Samveda - Mantra Number : 444
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 10;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(इन्द्र) हे परमात्मन् ! हम लोग (मधुमति) आत्मिक आनन्दयुक्त (प्रज्ञे) क्षेत्र में (उपक्षियन्तः) रहते हुए (रयिम्) विद्यादि धन को (पुष्येम) पुष्ट करें और (ते) आपका (धीमहे) ध्यान करें॥
Footnote
बृहदारण्यकोपनिषद् ४। ५। १५-१६ में आत्मा को मधु कहा है। “यही वह आत्मा है जो सब भूतों का अधिपति है” यहाँ से आरम्भ करके “यही वह मधु है” यहाँ तक। परन्तु यह आत्मा का माधुर्यरस आत्मज्ञानी ही पान करते हैं, अन्य मन्दभाग्य नहीं॥